द्रमुक और अन्नाद्रमुक के बीच विवाद की जड़ रहा कच्चातिवु मुद्दा लोस चुनाव से पहले फिर चर्चा में
गोला मनीषा
- 01 Apr 2024, 02:47 PM
- Updated: 02:47 PM
चेन्नई, एक अप्रैल (भाषा) भारत सरकार द्वारा 1974 में श्रीलंका को सौंपे गए छोटे-से द्वीप कच्चातिवु का भावनात्मक मुद्दा पूर्व मुख्यमंत्रियों एम. करुणानिधि और जे. जयललिता के बीच हमेशा विवाद की जड़ रहा और जयललिता ने मछुआरों के मुद्दों का समाधान करने के लिए इस द्वीप को वापस हासिल करने तक का आह्वान किया था।
इस निर्जन द्वीप को 1974 में श्रीलंका को तब सौंप दिया गया था जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने श्रीलंका के अपने समक्ष एस. भंडारनायके के साथ किए गए भारत-श्रीलंका समुद्री समझौते के तहत कच्चातिवु को श्रीलंकाई क्षेत्र माना था। इस समझौते का उद्देश्य पाक जलसंधि में समुद्री सीमाओं के मसले को हल करना था।
इसके बाद 1976 में एक और समझौते पर हस्ताक्षर किए गए जिसके तहत दोनों देशों के मछुआरों को एक-दूसरे के विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र में मछली पकड़ने से रोक दिया गया।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सोमवार को इस मुद्दे को लेकर कांग्रेस तथा उसके सहयोगी दल द्रविड़ मुनेत्र कषगम (द्रमुक) को आड़े हाथों लिया जो समझौते के वक्त सत्ता में थे। इसके बाद तमिलनाडु में लोकसभा चुनाव के लिए 19 अप्रैल को होने वाले मतदान से कुछ दिनों पहले यह मुद्दा अब केंद्र में आ गया है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) इस द्वीप को श्रीलंका को सौंपने के लिए कांग्रेस तथा द्रमुक को जिम्मेदार ठहरा रही है।
द्रमुक अध्यक्ष और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन ने कच्चातिवु मुद्दे को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा उनकी आलोचना किए जाने पर सोमवार को पलटवार करते हुए चुनाव से पहले मछुआरों के लिए भाजपा के ‘‘अचानक उमड़े प्यार’’ पर सवाल उठाया। उन्होंने तमिलनाडु द्वारा मांगे 37,000 करोड़ रुपये के बाढ़ राहत पैकेज समेत कई मुद्दों को लेकर भी प्रधानमंत्री पर सवाल उठाया।
तमिलनाडु में राजनीतिक दल और मछुआरे संघ कथित समुद्री उल्लंघन के लिए तमिलनाडु के मछुआरों को श्रीलंका द्वारा गिरफ्तार किए जाने के इकलौते समाधान के तौर पर कच्चातिवु को वापस हासिल करने पर लंबे समय से जोर देते रहे हैं।
उनका कहना है कि भारतीय मछुआरों के इस विवादित द्वीप पर मछली पकड़ने के पारंपरिक अधिकार हैं।
जयललिता ने इस द्वीप को फिर से हासिल करने के लिए उच्चतम न्यायालय में खुद याचिका दायर की थी। बाद में अन्नाद्रमुक की अगुवाई वाली राज्य सरकार ने खुद को मामले में पक्षकार बनाया था।
कांग्रेस और द्रमुक पर प्रहार जारी रखते हुए विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी सोमवार को दावा किया कि कांग्रेस के प्रधानमंत्रियों ने कच्चातिवु द्वीप को लेकर उदासीनता दिखायी और भारतीय मछुआरों के अधिकार छीन लिए।
जयशंकर ने एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी जैसे प्रधानमंत्रियों ने कच्चातिवु को एक ‘‘छोटा द्वीप’’ और ‘‘छोटी चट्टान’’ बताया था। उन्होंने कहा कि यह मुद्दा अचानक सामने नहीं आया है बल्कि यह हमेशा से एक जीवंत मुद्दा है।
कच्चातिवु को वापस लेने का मुद्दा प्रमुख द्रविड़ दलों के बीच तीखी बहस का विषय रहा है। जून 2016 में तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता ने करुणानिधि पर इस द्वीप को श्रीलंका को सौंपने से रोकने के लिए ‘‘कुछ न करने’’ का आरोप लगाया था।
उन्होंने इस मुद्दे पर ‘आंख मूंदने’’ और फिर विधानसभा में इसे उठाने के लिए द्रमुक की तुलना अंग्रेजी की एक लघु कथा के एक पात्र ‘रिप वैन विंकल’ से की जो 20 वर्षों तक सोता रहता है।
वहीं, करुणानिधि ने जयललिता से पूछा था कि वह 1991 से लेकर अब तक क्या करती रहीं जबकि उन्होंने इसे वापस लेने का वादा किया था।
उन्होंने दावा किया था कि उन्होंने कभी इस द्वीप को श्रीलंका को सौंपने के समझौते को स्वीकार नहीं किया। करुणानिधि ने कहा था कि उन्होंने तब राज्य के मुख्यमंत्री के तौर पर पुरजोर विरोध जताया था।
जयललिता ने 1994 में इस मुद्दे को तत्कालीन प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हा राव के समक्ष उठाया था और कहा था कि ‘‘भारत सरकार ने बेहतर द्विपक्षीय संबंधों के हित में इस छोटे-से द्वीप को श्रीलंका को सौंपने का फैसला लिया था।’’
जयललिता ने जून 2016 में प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात की थी और कच्चातिवु को वापस लेने तथा तमिलनाडु और श्रीलंका के मछुआरों के बीच लंबे समय से जारी विवाद को हल करने की मांग की थी।
भाषा गोला