राज्य का सभी के साथ समान व्यवहार करने का सकारात्मक दायित्व : उच्चतम न्यायालय
प्रशांत
- 05 Nov 2024, 08:50 PM
- Updated: 08:50 PM
नयी दिल्ली, पांच नवंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि धर्मनिरपेक्षता की सकारात्मक अवधारणा के लिए यह जरूरी है कि राज्य अल्पसंख्यक संस्थानों के साथ धर्मनिरपेक्ष संस्थानों की तरह ही व्यवहार करे तथा सभी के प्रति एक जैसा रुख रखे, भले ही उनकी आस्था और विश्वास कुछ भी हो।
प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) डी.वाई. चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने 2004 के उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा कानून की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखते हुए यह टिप्पणी की।
शीर्ष अदालत ने 22 मार्च के इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश को खारिज कर दिया, जिसमें मदरसा कानून को इस आधार पर रद्द कर दिया गया था कि यह धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत का उल्लंघन करता है।
पीठ ने कहा, “ धर्मनिरपेक्षता की सकारात्मक अवधारणा के लिए यह आवश्यक है कि राज्य अल्पसंख्यक संस्थाओं के साथ धर्मनिरपेक्ष संस्थाओं की तर्ज पर समान व्यवहार करने के लिए सक्रिय कदम उठाए, तथा उन्हें अपना अल्पसंख्यक चरित्र बनाए रखने की अनुमति दे। सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता राज्य को कुछ व्यक्तियों के साथ अलग-अलग व्यवहार करने की अनुमति देती है, ताकि सभी व्यक्तियों के साथ समान व्यवहार किया जा सके।”
पीठ ने कहा कि मौलिक अधिकारों में नकारात्मक और सकारात्मक दोनों ही अवधारणाएं शामिल हैं और राज्य को अपनी शक्ति पर नियंत्रण रखना चाहिए तथा इन अधिकारों के प्रयोग के लिए अनुकूल परिस्थितियां बनानी चाहिए।
अनुच्छेद 30(1) का हवाला देते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि यह समानता और धर्मनिरपेक्षता के मूल सिद्धांत को बनाए रखते हुए विभिन्न प्रकार के लोगों, विविध भाषाओं और विभिन्न मान्यताओं को मान्यता देता है और उन्हें संरक्षित करता है।
फैसले में कहा गया है, “सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता की भावना से, अनुच्छेद 30 धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को उनकी कम संख्या के कारण विशेष अधिकार प्रदान करता है तथा उनमें सुरक्षा और विश्वास की भावना पैदा करता है।”
उच्चतम न्यायालय ने धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत के उल्लंघन के लिए एक कानून की वैधता को चुनौती देने पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यह दर्शाया जाना चाहिए कि कानून ने धर्मनिरपेक्षता पर संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन किया है।
पीठ ने कहा, “धर्मनिरपेक्षता समानता के अधिकार का एक पहलू है। अनुच्छेद 14, 15 और 16 में उल्लिखित समानता संहिता इस सिद्धांत पर आधारित है कि सभी व्यक्तियों को, चाहे उनका धर्म कुछ भी हो, समाज में रहने के लिए समान पहुंच होनी चाहिए। राज्य सरकारी नौकरियों के मामलों में किसी विशेष धर्म से संबंधित व्यक्तियों को वरीयता नहीं दे सकता।”
पीठ की ओर से फैसला लिखने वाले प्रधान न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने कहा कि समानता संहिता राज्य को अपनी किसी भी धर्मनिरपेक्ष गतिविधि में धर्म को शामिल करने से रोकती है।
उन्होंने कहा, “ समानता संहिता राज्य पर सभी व्यक्तियों के साथ समान व्यवहार करने के लिए कुछ सकारात्मक दायित्व डालती है, चाहे उनका धर्म, आस्था या विश्वास कुछ भी हो।”
उच्चतम न्यायालय ने कहा कि शैक्षणिक संस्थाओं के संचालन के अल्पसंख्यकों के अधिकार में समुदाय और संस्था के हित में इसके मामलों का प्रबंधन करने का अधिकार भी शामिल है।
पीठ ने कहा,“हालांकि, अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों के संचालन का अधिकार पूर्ण नहीं है। शैक्षणिक संस्थानों के संचालन के अधिकार में अल्पसंख्यक संस्थानों का दायित्व और कर्तव्य है कि वे छात्रों को शिक्षा का एक मानक प्रदान करें।”
शीर्ष अदालत ने कहा, “ राज्य शैक्षिक मानकों की दक्षता और उत्कृष्टता को बढ़ावा देने के लिए नियामक कानून बना सकता है। शिक्षा के मानकों के बारे में नियमन सीधे अल्पसंख्यक संस्थानों के प्रबंधन पर लागू नहीं होते हैं। राज्य शिक्षा के मानकों के पहलुओं जैसे अध्ययन के पाठ्यक्रम, शिक्षकों की योग्यता और नियुक्ति, छात्रों के स्वास्थ्य और स्वच्छता, और पुस्तकालयों की सुविधाओं को नियमित कर सकता है।”
भाषा नोमान