भारत औपनिवेशिक युग की मानसिकता से तेजी से बाहर निकाल रहा है: धनखड़
नोमान धीरज
- 04 Nov 2024, 08:22 PM
- Updated: 08:22 PM
नयी दिल्ली, चार नवंबर (भाषा) उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने सोमवार को कहा कि भारत औपनिवेशिक युग के विचारों और प्रतीकों को चुनौती देकर अपनी औपनिवेशिक मानसिकता से तेजी से बाहर निकल रहा है।
यहां भारतीय लोक प्रशासन संस्थान (आईआईपीए) की आम सभा की 70वीं वार्षिक बैठक को संबोधित करते हुए धनखड़ ने कहा, ‘‘ भारतीय लोक प्रशासन में भारतीय विशेषताएं होनी चाहिए, जो औपनिवेशिक मानसिकता से परे होने के साथ ही स्वतंत्रता के बाद की हमारी आकांक्षाओं के अनुरूप हो।’’
उन्होंने कहा कि भारत औपनिवेशिक विचारों और प्रतीकों को चुनौती दे रहा है। उपराष्ट्रपति ने कहा कि किंग्स वे अब कर्तव्य पथ बन गया है और रेसकोर्स भी अब लोक कल्याण मार्ग हो गया है।
धनखड़ ने कहा, “ नेताजी बोस की प्रतिमा उस छतरी के नीचे स्थापित की गई है, जहां कभी किंग जॉर्ज की प्रतिमा हुआ करती थी। भारतीय नौसेना के ध्वज में हमारा तिरंगा शामिल कर दिया गया और औपनिवेशिक काल के 1,500 कानून अब कानून की किताब में नहीं हैं ।”
उपराष्ट्रपति ने रेखांकित किया कि नए फौजदारी कानून, भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम ने भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली को औपनिवेशिक विरासत से मुक्त कर दिया है।
उन्होंने कहा कि भारत तेजी से औपनिवेशिक मानसिकता से बाहर निकल रहा है। धनखड़ ने कहा, “अब हमें चिकित्सा या प्रौद्योगिकी सीखने के लिए अंग्रेजी की आवश्यकता नहीं है।”
उपराष्ट्रपति ने कहा कि लोक प्रशासन अगर इन मूल्यों को आत्मसात नहीं करता है तो वह राष्ट्रीय हित और भावना के साथ तालमेल नहीं बिठा पाएगा।
सरकारी अधिकारियों में भावनात्मक बुद्धिमत्ता और व्यवहारिक कौशल के महत्व पर प्रकाश डालते हुए धनखड़ ने कहा, ‘‘अपने प्रशिक्षुओं की भावनात्मक बुद्धिमत्ता पर अधिक ध्यान दें। सरकारी अधिकारियों के बीच व्यवहारिक कौशल, भावनात्मक बुद्धिमत्ता और सांस्कृतिक क्षमता विकसित करना महत्वपूर्ण है, ताकि अधिकारी हाशिए पर पड़े और वंचित लोगों के संघर्षों को समझ सकें।”
अपने संबोधन में धनखड़ ने लोक सेवकों की समस्या-समाधान क्षमताओं को बढ़ाने और नैतिक नेतृत्व को सुदृढ़ करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि नैतिक मानक देश की सभ्यता के लिए मौलिक हैं, लेकिन प्रलोभन का सामना करने के लिए उन्हें निरंतर पोषित करने की आवश्यकता है।
लोक प्रशासन में प्रौद्योगिकी अपनाने के महत्व पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि आईआईपीए के प्रशिक्षण कार्यक्रमों और अनुसंधान पहल को कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ब्लॉकचेन और डेटा एनालिटिक्स जैसी उभरती प्रौद्योगिकियों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, साथ ही सार्वजनिक सेवा वितरण में उनके नैतिक और जिम्मेदार कार्यान्वयन को सुनिश्चित करना चाहिए।
उपराष्ट्रपति ने इस बात पर जोर दिया कि प्रौद्योगिकी को अपनाते समय यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि इससे और अधिक विभाजन पैदा न हो।
उन्होंने कहा कि तेजी से बढ़ती प्रौद्योगिकी समाज के सबसे कमजोर वर्गों को अलग-थलग कर सकती है। धनखड़ ने कहा कि इसलिए, दृष्टिकोण समावेशी और ‘अंत्योदय’ से प्रेरित होना चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि तकनीकी प्रगति देश की आबादी के सभी कोनों तक पहुंचे।
कल्याणकारी उपायों के प्रभाव का आकलन करने के लिए डेटा-संचालित और साक्ष्य आधारित अध्ययनों की आवश्यकता पर बल देते हुए, धनखड़ ने रेखांकित किया कि निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में डेटा को सबसे आगे रखा जाना चाहिए।
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