राज्यों को औद्योगिक अल्कोहल के विनियमन का अधिकार है : उच्चतम न्यायालय
आशीष माधव
- 23 Oct 2024, 10:11 PM
- Updated: 10:11 PM
नयी दिल्ली, 23 अक्टूबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को एक फैसले में कहा कि राज्यों को औद्योगिक अल्कोहल के उत्पादन, विनिर्माण और आपूर्ति करने का नियामक अधिकार है। शीर्ष अदालत ने केंद्र के इस रुख को भी खारिज कर दिया कि इसका विनियमन करना उसके विशेष अधिकार क्षेत्र में है।
अदालत ने यह भी कहा कि संसद के पास मादक शराब के उद्योग पर नियंत्रण करने के लिए कानून बनाने की विधायी शक्ति नहीं है।
यह निर्णय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे राज्य सरकारों के लिए राजस्व के एक बड़े स्रोत का द्वार खुल गया है।
न्यायालय ने एक के मुकाबले आठ के बहुमत से पारित अपने फैसले में कहा कि संविधान की सातवीं अनुसूची में राज्य सूची की प्रविष्टि आठ में ‘‘मादक शराब’’ वाक्यांश के दायरे में औद्योगिक अल्कोहल भी शामिल होगी।
बहुमत पीठ में प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति हृषिकेश रॉय, न्यायमूर्ति अभय एस ओका, न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला, न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा, न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां, न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह शामिल थे।
हालांकि, न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना ने इससे असहमति जताते हुए कहा कि राज्यों के पास औद्योगिक अल्कोहल या मिलावटी स्पिरिट को विनियमित करने की विधायी शक्ति नहीं है।
उच्चतम न्यायालय के बहुमत के फैसले ने 1990 के सात न्यायाधीशों की पीठ के फैसले को पलट दिया, जिसमें कहा गया था कि औद्योगिक अल्कोहल के उत्पादन पर नियामक शक्ति केंद्र के पास है।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘इस बात पर ध्यान दिए बिना कि ‘उद्योग’ शब्द की व्याख्या संकीर्ण या व्यापक रूप में की जाती है (इस बिन्दु को दोनों पक्षों जोरदार चुनौती दी), सूची एक की प्रविष्टि 52 के अंतर्गत मादक शराब के उद्योग को संसद द्वारा अपने नियंत्रण में नहीं लिया जा सकता है।’’
बहुमत का फैसला लिखने वाले प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि प्रविष्टि आठ में ‘‘कच्चे माल से लेकर मादक शराब के उत्पादन तक’’ हर चीज को विनियमित करने का प्रयास किया गया है। सात न्यायाधीशों की तरफ से भी सीजेआई ने फैसला लिखा।
पीठ ने 364 पन्नों के फैसले में कहा कि संसद केवल सूची-एक की प्रविष्टि 52 के तहत घोषणा करके पूरे उद्योग के क्षेत्र पर कब्जा नहीं कर सकती।
बहुमत के फैसले में कहा गया है कि प्रविष्टि आठ में ‘‘मादक शराब’’ वाक्यांश में शराब से संबंधित वे सभी तरल पदार्थ शामिल हैं जो लोगों के स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
उच्चतम न्यायालय ने कहा कि जब राज्य और केंद्र की शक्तियों पर दो प्रविष्टियां एक दूसरे के कार्यक्षेत्र में प्रवेश कर जाती हैं, तो अदालत को उनमें सामंजस्य स्थापित करना चाहिए, लेकिन सामंजस्य की विधि में संघीय संतुलन बनाए रखना चाहिए।
संविधान की 7वीं अनुसूची के अंतर्गत राज्य सूची की प्रविष्टि आठ, राज्यों को ‘‘मादक शराब’’ के निर्माण, कब्जे, परिवहन, खरीद और बिक्री पर कानून बनाने का अधिकार देती है। वहीं संघ सूची की प्रविष्टि 52 और समवर्ती सूची की प्रविष्टि 33 में उन उद्योगों का उल्लेख है जिनके नियंत्रण को ‘‘संसद ने कानून द्वारा सार्वजनिक हित में समीचीन घोषित किया है।’’
संसद और राज्य विधानमंडल दोनों समवर्ती सूची में उल्लिखित विषयों पर कानून बना सकते हैं, लेकिन केंद्रीय कानून को राज्य कानून पर प्राथमिकता दी जाएगी।
उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और केरल सहित कई राज्य सरकारों ने सात न्यायाधीशों की पीठ के फैसले और केंद्र के इस रुख को भी चुनौती दी थी कि औद्योगिक अल्कोहल पर उसका विशेष नियंत्रण है।
उत्तर प्रदेश सहित कई राज्य सरकारों ने सात न्यायाधीशों की पीठ के फैसले और केंद्र के इस रुख को चुनौती दी थी कि औद्योगिक शराब पर उसका विशेष नियंत्रण है।
केंद्र सरकार ने संघ सूची की प्रविष्टि 52 में अपनी शक्ति का उल्लेख किया और कहा कि संविधान के निर्माताओं का इरादा "सार्वजनिक हित" में औद्योगिक (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951 के अधिनियमन के माध्यम से केंद्र को किसी भी उद्योग पर पूर्ण नियंत्रण देने का था।
सात न्यायाधीशों की पीठ ने 1990 में कहा था कि उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951 के माध्यम से संघ ने इस विषय पर विधायी क्षमता हासिल करने की स्पष्ट मंशा व्यक्त की है, इसलिए प्रविष्टि 33 राज्य सरकार को सशक्त नहीं बना सकती।
भाषा आशीष