चुनाव से कोई देश लोकतांत्रिक नहीं बनता, लोगों की आवाज सुनी जानी चाहिए: सोनम वांगचुक
जोहेब धीरज
- 19 Oct 2024, 06:59 PM
- Updated: 06:59 PM
(अंजलि ओझा)
नयी दिल्ली, 19 अक्टूबर (भाषा) लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने समेत विभिन्न मांगों को लेकर दिल्ली में पिछले 14 दिन से अनशन कर रहे जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने कहा कि केवल चुनावों से ही कोई देश लोकतांत्रिक नहीं बन जाता बल्कि यह तभी हो सकता है जब लोगों की आवाज सुनी जाए।
लेह से दिल्ली तक की पदयात्रा का नेतृत्व करने वाले वांगचुक को पिछले महीने उनके कई समर्थकों के साथ हिरासत में लिया गया था और बाद में रिहा कर दिया गया था।
वह तब से देश के शीर्ष नेतृत्व से मुलाकात की मांग को लेकर अपने करीब दो दर्जन समर्थकों के साथ यहां लद्दाख भवन में अनिश्चितकालीन अनशन पर हैं।
सरकार की ओर से अब तक किसी भी बैठक के बारे में कोई सूचना नहीं दी गई है। छह अक्टूबर से सिर्फ नमक का पानी घोल पीकर अनशन कर रहे वांगचुक ने अफसोस जताते हुए कहा कि उनके समर्थकों को भवन के चारों ओर अवरोधक लगाकर उनसे मिलने से रोका जा रहा है।
कई दिन के उपवास के बाद शारीरिक रूप से कमजोर हो चुके वांगचुक ने मद्धिम आवाज में बात की।
वांगचुक ने ‘पीटीआई-भाषा’ को दिए साक्षात्कार में कहा, “जैसा कि आप देख सकते हैं, यहां (लद्दाख भवन में) पाबंदियां हैं। वे तय कर रहे हैं कौन अंदर आ सकता है और कौन नहीं। वे लोगों को यहां पार्क में इकट्ठा होने की भी अनुमति नहीं दे रहे। शायद हमें मिल रहे समर्थन से कुछ डर है। वे उन लोगों से डरते हैं जो चुपचाप अनशन करना चाहते हैं।”
वांगचुक ने कहा कि दिल्ली आने के बाद से उनके साथ जो कुछ हुआ, उसे लोकतांत्रिक नहीं कहा जा सकता।
उन्होंने कहा, “यह लोकतंत्र के लिए दुखद है। देश के एक छोर से, सीमावर्ती इलाकों से लोग राष्ट्रीय राजधानी में आए... 150 लोग, जिनमें 80 से अधिक उम्र के लोग, महिलाएं और भारत की सीमाओं की रक्षा करने वाले सेवानिवृत्त सैनिक शामिल हैं। दिल्ली आने के बाद उन्हें हिरासत में लिया गया और फिर अनशन पर बैठने के लिए मजबूर किया गया।”
उन्होंने कहा, ‘‘इतना कुछ होने के बावजूद वे (सरकार) सुनने को भी तैयार नहीं हैं। मेरे समझ नहीं आ रहा कि इसे लोकतंत्र कैसे कहूं... केवल चुनाव किसी देश को लोकतांत्रिक नहीं बनाते, आपको लोगों का और उनकी आवाज का सम्मान करना होगा। मैं लोकतंत्र और वह भी दुनिया के सबसे बड़े लोकंतत्र के लिए दुखी हूं।”
उन्होंने कहा, “लोकतंत्र में सरकार को इतना निर्दयी नहीं होना चाहिए, खासकर तब जब बात सीमावर्ती क्षेत्र से आए लोगों की हो। हमने वर्षों तक, 5-6 युद्ध में अपनी सीमाओं की रक्षा की है। इस तरह के व्यवहार से लोगों का मनोबल और उनकी देशभक्ति प्रभावित हो सकती है।”
वांगचुक ने कहा, ‘‘अभी तक किसी ने हमसे संपर्क नहीं किया है। हम यहीं बैठे रहेंगे। हमें कोई जल्दी नहीं है। विरोध जारी रहने से शायद सरकार हमारी बात सुन ले।’’
उन्होंने कहा, ‘‘हम यह नहीं कह रहे हैं कि हमें आज अंतिम फैसला सुना दें, हम बस उनसे बातचीत फिर से शुरू करने का आग्रह कर रहे हैं।’’
भाषा जोहेब