उत्तराखंड में जिलाधिकारियों को हफ्ते भर मे ‘मक डंपिंग जोन’ के लिए जमीन ढूंढने के निर्देश
दीप्ति पारुल
- 14 Oct 2024, 07:11 PM
- Updated: 07:11 PM
देहरादून, 13 अक्टूबर (भाषा) उत्तराखंड में जिलाधिकारियों से सोमवार को एक सप्ताह के भीतर अपने क्षेत्रों में ऐसी भूमि चिन्हित करने को कहा गया, जहां मानसून के दौरान भूस्खलन या सड़क निर्माण परियोजनाओं से पैदा होने वाले मलबे का सुव्यवस्थित तरीके से निस्तारण किया जा सके।
प्रदेश की मुख्य सचिव राधा रतूड़ी ने सीमा सड़क संगठन (बीआरओ), राष्ट्रीय राजमार्ग अवसंरचना विकास निगम लिमिटेड (एनएचआईडीसीएल) और लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) के साथ इस संबंध में हुई एक महत्वपूर्ण बैठक में यह निर्देश दिया।
रतूड़ी ने सभी जिलाधिकारियों को आगामी पांच वर्षों की आवश्यकता को देखते हुए मलबा निस्तारण के लिए भूमि (मक डंपिंग जोन) चिन्हित करने और सरकार को प्रस्ताव भेजने के लिए एक हफ्ते का समय दिया।
उन्होंने जिलाधिकारियों को मलबा निस्तारण के लिए राजस्व भूमि को प्राथमिकता देने और उनकी अनुपलब्धता की सूरत में वन भूमि को चिहिन्त करने के निर्देश दिए।
मुख्य सचिव ने सड़क परियोजनाओं में शामिल एजेंसियों को निर्धारित ‘मक डंपिंग जोन’ में ही मलबे का निस्तारण करने का सख्ती से पालन करने का निर्देश देते हुए चेतावनी दी कि नियमों की अवहेलना करने वाली एजेंसियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
रतूड़ी ने पीडब्ल्यूडी, बीआरओ और एनएचआईडीसीएल के अधीन विभिन्न राष्ट्रीय राजमार्गों में निर्माण के दौरान उत्सर्जित मलबे के निस्तारण के लिए पूर्व में चिन्हित ‘मक डंपिंग जोन’ के भर जाने की स्थिति में उनके विस्तार की संभावनाओं का अध्ययन करने को भी कहा।
उन्होंने जिलाधिकारियों को ‘मक डंपिंग जोन’ में मलबे के जमा होने के बाद उसके उपयोग को लेकर कार्ययोजना बनाने के निर्देश भी दिए।
रतूड़ी ने जिलअधिकारियों को ऐसे स्थानों पर हरित पटि्टयां विकसित करते हुए बांस के पौधे लगाने के निर्देश भी दिए। उन्होंने कहा कि ऐसी जगहों पर तेजी से विकसित होने वाले वृक्ष लगाए जाएंगे, जो भविष्य में ‘क्रैश बैरियर’ के रूप में उपयोगी साबित होंगे।
मुख्य सचिव ने पीडब्ल्यूडी, बीआरओ और एनएचआईडीसीएल जैसी एजेंसियों के साथ ही राजस्व एवं वन विभाग से भी भूमि चयन के लिए संबंधित जिलाधिकारियों के साथ समन्वय करने तथा सयुंक्त निरीक्षण करने को कहा।
मलबा निस्तारण के लिए भूमि चिन्हित करने से संबंधित उक्त कार्यदायी संस्थाओं से उत्तराखंड में अगले पांच वर्षों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए कुल 81.99 हेक्टेयर भूमि की मांग रखी गई है, जिसमें वर्तमान में उपलब्ध 55.69 हेक्टेयर भूमि भी शामिल है।
भाषा
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