अत्यंत असुरक्षित और चिंताजनक स्थिति में रह रहीं रोहिंग्या शरणार्थी महिलाएं
360 इंफोडॉटओआरजी सिम्मी मनीषा
- 26 Mar 2024, 05:45 PM
- Updated: 05:45 PM
(सुचित्रा सेनगुप्ता, द ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल एंड डेवलपमेंट स्टडीज, जिनेवा)
जिनेवा, 26 मार्च (360 इंफो) रोहिंग्या शरणार्थी शिविरों में महिलाएं गरीबी और असुरक्षा के बीच अत्यंत चिंताजनक स्थिति में जीवन बिता रही हैं।
शगुफ्ता (37) उन कुपोषित महिलाओं में शामिल हैं जो शिविर 14 यानी ‘विधवा खंड’ की तंग झोंपड़ियों में रह रही हैं। वह रखाइन में जातीय धार्मिक हिंसा के बाद 2017 में अपने दो बच्चों के साथ कॉक्स बाजार में शरण लेने पहुंची थीं। इस हिंसा ने हजारों मुसलमान रोहिंग्या शरणार्थियों को म्यांमा-बांग्लादेश सीमा पार कर ‘कॉक्स बाजार’ में शरण लेने के लिए मजबूर कर दिया।
अधिकतर मानवीय संकट महिलाओं और बच्चों को सबसे अधिक प्रभावित करते हैं लेकिन रोहिंग्या आपदा विशेषकर महिलाओं के लिए और भी बदतर है। रोहिंग्या महिला शरणार्थियों के पास स्थिर आर्थिक अवसरों तक बहुत कम पहुंच है या कोई पहुंच ही नहीं है और वह गरीबी में रहने को मजबूर हैं। ऐसे में कई महिलाओं ने आजीविका के साधन के रूप में वेश्यावृत्ति को अपना लिया है।
शिविरों में सुरक्षा संबंधी स्थिति बहुत खराब है और महिलाओं के खिलाफ यौन उत्पीड़न सहित कई अपराधों की खबरें सामने आ रही हैं।
शगुफ्ता की स्थिति उन रोहिंग्या शरणार्थी महिलाओं की असुरक्षाओं और कमजोरियों को दर्शाती हैं जो विस्थापन और इसके परिणामस्वरूप विदेशी भूमि में अपनेपन की कमी से उत्पन्न होती हैं।
रोहिंग्या पलायन के दो साल बाद केवल 20 विधवा शरणार्थी शिविरों की तंग झोपड़ियों में रहती थीं। पिछले कुछ साल में उनकी संख्या में वृद्धि हुई, लेकिन उनकी स्थिति में सुधार नहीं हुआ।
शगुफ्ता अन्य ‘‘विधवाओं’’ की तरह अत्यधिक अभाव और निरंतर हिंसा की स्थिति में अपने घर के लिए अकेले आजीविका कमाती है। उन्होंने प्रत्येक शिविर ब्लॉक के लिए एक प्रतिनिधि चुना है जो शिविरों में समन्वय और नेतृत्व का प्रतीक है।
ये प्रतिनिधि शरणार्थियों और शिविर-प्रभारी के बीच अक्सर मध्यस्थ के रूप में कार्य करते हैं। यह स्थिति 2017 से पहले की स्थिति से बिल्कुल विपरीत है जब वे शायद ही कभी अपनी बात रख पाते थे।
हिंसक संघर्षों का महिलाओं पर अधिक प्रभाव पड़ता है क्योंकि उनके लैंगिक-विशिष्ट मानवाधिकारों के उल्लंघन का खतरा होता हैं। राजनीतिक मान्यताओं, जातीयता, धर्म और राष्ट्रीयता के कारण महिलाएं अधिक उत्पीड़ित हैं।
कॉक्स बाजार के 34 रोहिंग्या शिविरों में भी महिलाओं की ऐसी ही स्थिति है। ‘मानवीय आवश्यकताएं और प्रतिक्रिया योजना’ 2024 रिपोर्ट में कहा गया है कि महिलाएं और बच्चे सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं, जिनमें से कई कुपोषण से पीड़ित हैं।
उन्हें स्वास्थ्य देखभाल, शिक्षा, खाद्य सुरक्षा, संरक्षण और मनोवैज्ञानिक मदद की सख्त जरूरत है। वैश्विक महामारी के दौरान रोहिंग्याओं के बीच वित्तीय संकट और आर्थिक संकट गहरा गया है।
‘विधवा खंड’ में रहने वाली महिलाओं के पास धन अन्य शरणार्थियों की तुलना में कम है और उनके पास उसी हिसाब से सुविधाएं भी अन्य शरणार्थियों की तुलना में कम हैं।
बांग्लादेश में रोहिंग्या समुदायों को सहायता प्रदान करने के लिए गठित गैर सरकारी संगठन लैंगिक अधिकारों को सुनिश्चित करने और महिलाओं एवं बच्चों के खिलाफ यौन हिंसा को रोकने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।
सत्रह वर्षीय परवीन इकबाल (बदला हुआ नाम) अपने परिवार के साथ अगस्त 2017 में जब रखाइन राज्य से भागी थीं तब वह माध्यमिक स्कूल में थीं। उन्होंने पढ़ाई जारी रखने का अपना दृढ़ निश्चय नहीं छोड़ा और अब एनजीओ की मदद से वह नौकरी कर रही हैं। परवीन जैसी कुछ महिलाएं हैं जिनकी स्थिति शिक्षा और रोजगार तक पहुंच के कारण बदल रही है।
सफलता की ऐसी कुछेक कहानियों के बावजूद महिलाओं के आगे बढ़ने में कई बाधाएं हैं। गंभीर आर्थिक संकट के बीच बाल विवाह और कम उम्र में गर्भधारण की खबरें आम हैं।
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