मैसूर पैलेस में दशहरा के भव्य आयोजन के लिए तैयारियां पूरी
आशीष अविनाश
- 02 Oct 2024, 07:02 PM
- Updated: 07:02 PM
मैसूर, दो अक्टूबर (भाषा) मैसूर पैलेस में दशहरा उत्सव इस बार धूम धाम से मनाए जाने के लिए तैयारियां पूरी हो चुकी हैं। दस दिवसीय उत्सव के दौरान विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।
दशहरा या नवरात्रि उत्सव को मनाने की परंपरा 1610 में शुरू हुई थी। ‘नाद हब्बा’ (राज्य उत्सव) के रूप में मनाया जाने वाला यह उत्सव इस वर्ष बेहद भव्य होगा, जिसमें कर्नाटक की समृद्ध संस्कृति और परंपराओं के साथ-साथ शाही शान-शौकत और वैभव का झरोखा भी दिखेगा।
दशहरा इस क्षेत्र के सबसे बड़े और सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक माना जाता है। यह उत्सव तत्कालीन मैसूर राजवंश के शाही संरक्षण में जनता के त्योहार के रूप में विकसित हुआ। भारत के स्वतंत्र और गणतंत्र बनने के बाद, परंपराओं को जारी रखते हुए अब इसे कर्नाटक सरकार के तत्वावधान में मनाया जा रहा है।
प्रसिद्ध लेखक और विद्वान हम्पा नागराजैया तीन अक्टूबर को सुबह 9.15 से 9.45 बजे के बीच शुभ ‘‘वृश्चिक लग्न’’ के दौरान यहां चामुंडी पहाड़ियों के ऊपर स्थित चामुंडेश्वरी मंदिर परिसर में उत्सव की शुरुआत करेंगे। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच मैसूर और उसके राजघरानों की अधिष्ठात्री देवी चामुंडेश्वरी की मूर्ति की पूजा की जाएगी।
उद्घाटन समारोह में नागराजैया के साथ कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धरमैया, मंत्रिमंडल के उनके कई सहयोगी, वरिष्ठ अधिकारी और अन्य लोग भी होंगे। उद्घाटन समारोह से पहले उनके चामुंडेश्वरी मंदिर जाने और देवी की पूजा करने की भी संभावना है।
अधिकारियों ने बताया कि हर साल की तरह इस 10 दिवसीय आयोजन में कर्नाटक की सांस्कृतिक विरासत को लोक कलाओं के साथ प्रदर्शित किया जाएगा। सिद्धरमैया ने हाल में कहा था कि राज्य में अच्छी बारिश के मद्देनजर इस साल मैसूर दशहरा को भव्यता और सार्थक तरीके से मनाने का फैसला किया गया है।
महल में नवरात्रि समारोह में कई अनुष्ठान शामिल होते हैं। इस दौरान पूर्ववर्ती मैसूर राजपरिवार के वंशज यदुवीर कृष्णदत्त चामराजा वाडियार वैदिक मंत्रोच्चार के बीच स्वर्ण सिंहासन पर चढ़कर दरबार का आयोजन करते हैं।
विभिन्न जिलों की झांकियां और राज्य भर से सांस्कृतिक दल जुलूस की शोभा बढ़ाएंगे। हाथियों को उनके शिविरों से लाकर जुलूस के लिए तैयार किया जाता है। अभिमन्यु नामक हाथी के इस बार भी विशेष प्रदर्शनी में हिस्सा लेने की संभावना है।
मैसूर में उत्सव की शुरुआत सबसे पहले वाडियार शासक, राजा वाडियार प्रथम ने वर्ष 1610 में की थी। 1971 में शाही शासकों के विशेषाधिकारों के बंद होने के बाद यह शाही परिवार का निजी मामला बन गया।
स्थानीय लोगों की पहल पर छोटे स्तर पर दशहरा का आयोजन किया जाता था, लेकिन राज्य सरकार ने इसमें हस्तक्षेप किया और तत्कालीन मुख्यमंत्री डी. देवराज उर्स ने 1975 में दशहरा समारोह को पुनर्जीवित किया, जो आज तक जारी है।
भाषा आशीष