आतंकवाद वित्तपोषण मामला: अदालत ने कैदियों को ई-मुलाकात सुविधा न दिये जाने के पीछे का तर्क पूछा
अमित सुरेश
- 01 Oct 2024, 07:26 PM
- Updated: 07:26 PM
नयी दिल्ली, एक अक्टूबर (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) से मंगलवार को सवाल किया कि आतंकवाद के वित्तपोषण के मामलों में अभियोजन का सामना कर रहे कैदियों को ‘ई-मुलाकात’ की अनुमति नहीं देने के फैसले के पीछे क्या कारण है, जबकि उन्हें अपने परिजनों से आमने-सामने मुलाकात की अनुमति है।
ऑडियो वीडियो ई-मुलाकात, कैदी फोन कॉल सुविधा का विस्तार है।
न्यायमूर्ति संजीव नरूला ने एनआईए से सवाल किया, ‘‘यदि वे डिजिटल तरीके से मुलाकात की सुविधा का लाभ उठा रहे हैं, तो नियम के अनुसार जांच एजेंसी से अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) की आवश्यकता होती है, लेकिन आमने-सामने की मुलाकात के लिए ऐसा कोई नियम नहीं है। यदि वे आमने-सामने की मुलाकात करने के लिए आ रहे हैं, तो एनओसी प्राप्त करने का कोई प्रावधान नहीं है। फिर यह तर्कहीन है। इस नियम के पीछे क्या तर्क है?’’
एनआईए की वकील ने जवाब में कहा कि परिवार के साथ डिजिटल मुलाकात के दौरान, कैदी अपनी स्थानीय भाषा में बात करते हैं और अधिकारी इससे अच्छी तरह वाकिफ नहीं होते हैं।
एनआईए की ओर से पेश वकील श्वेता सिंह ने कहा, ‘‘जिन गवाहों से जिरह की जानी है, वे उसी क्षेत्र से हैं। वे वहां बहुत शक्तिशाली लोग हैं। ये दोनों संगठन के प्रमुख सदस्य हैं और यह आशंका वास्तविक और गंभीर है कि वे अपने परिवार के सदस्यों के माध्यम से गवाहों को प्रभावित करने और धमकाने की कोशिश कर सकते हैं।’’
उन्होंने कहा कि जिस अपराध के लिए याचिकाकर्ता जेल में बंद हैं, उसकी प्रकृति के कारण एनआईए को इस मुद्दे की अलग दृष्टिकोण से पड़ताल करने की आवश्यकता है और इन कारणों से एनओसी देने से इनकार कर दिया गया है।
जमीर और मसासासोंग एओ की ओर से पेश अधिवक्ता एम एस खान ने कहा कि ई-मुलाकात सुविधा वीडियो कॉन्फ्रेंस सुविधा है और अगर अधिकारियों द्वारा बातचीत रिकॉर्ड की जाती है तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं होगी, भले ही जेल नियमावली या नियमों में ऐसा कोई प्रावधान न हो।
न्यायाधीश ने एनआईए की वकील से कहा, ‘‘वहां कोई अनुवादक नियुक्त करें। कम से कम आप याचिकाकर्ता की मां और नाबालिग बच्चों से फोन पर बात तो करा ही सकते हैं। वे केवल ई-मुलाकात के लिए कह रहे हैं।’’
याचिकाकर्ता के वकील द्वारा दिए गए बयान पर एनआईए के वकील ने कहा कि वह इस बारे में निर्देश लेंगी।
इस साल जेल अधिकारियों द्वारा जारी किया गया यह परिपत्र दिल्ली जेल नियमावली के नियम 631 के अंतर्गत आने वाले कैदियों से संबंधित है। नियम के अंतर्गत आने वाले कैदियों में सरकार के खिलाफ अपराध, आतंकवादी गतिविधियों और जघन्य अपराधों के लिए तथा महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम, राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम और सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम जैसे कानूनों के तहत आरोपी व्यक्ति शामिल हैं।
मसासासोंग एओ और अलेमा जमीर की याचिकाओं में उस परिपत्र को रद्द करने का अनुरोध किया गया है, जिसके तहत याचिकाकर्ताओं को दी जाने वाली ई-मुलाकात और फोन कॉल की सुविधा अचानक समाप्त कर दी गई तथा इसमें अधिकारियों को उनके लिए इसे बहाल करने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया है।
मसासासोंग के संबंध में एनआईए की सत्यापन रिपोर्ट देखने के बाद, अदालत ने एक अंतरिम आदेश में उसे अपने परिवार के साथ एक डिजिटल मुलाकात की अनुमति दी, जिसकी व्यवस्था दो सप्ताह बाद जेल अधिकारियों द्वारा की जाएगी।
एनएससीएन-आईएम की स्वयंभू 'कैबिनेट मंत्री' अलेमा जमीर को कथित आतंकवाद के वित्तपोषण के एक मामले में गिरफ्तार किया गया था। वह वर्तमान में तिहाड़ जेल में बंद हैं।
परिपत्र के तहत, जांच एजेंसी द्वारा एनओसी प्राप्त होने पर ही ई-मुलाकात टेलीफोन सुविधा की अनुमति दी गई है। इस मामले में जांच एजेंसी, एनआईए ने जमीर के अनुरोध को अस्वीकार कर दिया, जिसके बाद उसने अदालत का रुख किया।
जमीर के संबंध में, अदालत ने उसके वकील को निर्देश दिया कि वह सत्यापन के लिए एनआईए को विशिष्ट संपर्क नंबर दे, जिस पर वह मुलाकात/टेलीफोन सुविधा चाहती है।
फरवरी 2020 में गिरफ्तार और तिहाड़ जेल में बंद मसासासोंग को जेल से हर दिन पांच मिनट के लिए अपने नाबालिग बेटे और बेटी को फोन करने की अनुमति दी गई थी।
खान ने कहा कि याचिकाकर्ता के माता-पिता बुजुर्ग हैं, जो अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर हैं और अपनी बीमारियों से जूझ रहे हैं। उन्होंने कहा कि वह अपने माता-पिता और बच्चों के कल्याण के बारे में "बहुत चिंतित" हैं और उनसे बात करना ही उनके लिए एकमात्र सांत्वना है।
इसमें कहा गया है कि यह परिपत्र संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है क्योंकि विचाराधीन कैदी का अपने परिवार और वकील से संवाद करने का अधिकार मौलिक अधिकारों का एक अनिवार्य घटक है।
याचिका में कहा गया है कि परिपत्र और अधिकारियों की ओर से की गई कार्रवाई बिना किसी उचित वर्गीकरण या औचित्य के कैदियों के साथ भेदभाव करती है।
जेल नियमों के अनुसार, नियम 631 के तहत आने वाले कैदी सार्वजनिक सुरक्षा और व्यवस्था के मद्देनजर संचार सुविधा के पात्र नहीं हैं।
परिपत्र के अनुसार, दिल्ली जेल नियमावली, 2018 के नियम 631 के तहत आने वाले कैदियों और उच्च सुरक्षा वार्ड में बंद कैदियों को संबंधित अभियोजन एजेंसियों से अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) या अनुमोदन प्राप्त करने के बाद ही फोन कॉल सुविधा की अनुमति दी जा सकती है।
भाषा अमित