नीतियां दिव्यांग बच्चों के लिए बाधाओं को दूर करने वाली होनी चाहिए : न्यायमूर्ति नागरत्ना
सुभाष पवनेश
- 28 Sep 2024, 05:06 PM
- Updated: 05:06 PM
नयी दिल्ली, 28 सितंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय की न्यायाधीश बी.वी. नागरत्ना ने शनिवार को कहा कि नीतियां दिव्यांग बच्चों के लिए बाधाओं को दूर करने वाली होनी चाहिए क्योंकि इन अवरोधों को हटाने से उन्हें समाज में एकीकृत करने का मार्ग प्रशस्त होता है।
उच्चतम न्यायालय की किशोर न्याय समिति द्वारा यूनिसेफ के सहयोग से आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते हुए न्यायमूर्ति नागरत्ना ने यह बात कही। न्यायमूर्ति नागरत्ना किशोर न्याय समिति की अध्यक्ष भी हैं।
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा, ‘‘ऐसी दुनिया में, जहां संसाधन सीमित हैं और कई सारी प्रतिस्पर्धी प्राथमिकताएं हैं, यह सुनिश्चित करना सर्वोपरि है कि दिव्यांग बच्चों को प्रभावित करने वाली नीतियां ठोस आंकड़ों और गहन शोध पर आधारित हों।’’
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि समावेशी शब्दावली पर पुस्तिका का विमोचन प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) डी वाई चंद्रचूड़ द्वारा कार्यक्रम के दौरान किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि बच्चों और दिव्यांगजनों को अपनी कमजोरियों और समाज में मौजूद बाधाओं के कारण संघर्ष करना पड़ता है तथा जब ये दूर कर दी जाती हैं, तो उन्हें अवसर समान रूप से मिलते हैं और वे समाज का हिस्सा बन जाते हैं।
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा, ‘‘इसलिए, नीतियों को इन्हें (बाधाओं) को दूर करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।’’
उन्होंने कहा, ‘‘बाधाओं को दूर करने का मतलब यह सुनिश्चित करना है कि हमारी योजनाएं और सेवाएं समावेशी हों और उनमें उचित समायोजन शामिल हो। बच्चों के लिए सुरक्षा सेवाओं के संदर्भ में इसका मतलब है कि दिव्यांग बच्चों की स्थिति की गहन समझ होनी चाहिए और सही जानकारी, अद्यतन आंकड़े और ज्ञान के स्रोतों तक उनकी पहुंच होनी चाहिए।’’
न्यायाधीश ने अपने संबोधन के दौरान कहा कि इसमें नियमित और प्रासंगिक सर्वेक्षण करना, दिव्यांगजनों के अधिकार (आरपीडब्ल्यूडी) अधिनियम के अनुसार दिव्यांगता संकेतकों को प्रस्तुत करना, साथ ही दिव्यांगता की पहचान, शीघ्र निदान और रेफरल के लिए उपयुक्त संपर्क सेवाएं प्रदान करना भी शामिल हो।
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि समुदायों, घरों, स्कूलों और पड़ोस में दिव्यांग बच्चों द्वारा सही जाने वाली धौंस से उनका मानसिक तनाव बढ़ता है, जिससे वे सामाजिक जीवन से विमुख हो जाते हैं, स्कूल छोड़ देते हैं।
उन्होंने कहा कि संविधान के प्रावधानों के अनुसार, सरकार का दायित्व न केवल सार्वजनिक शिक्षा और स्वास्थ्य को अपना प्राथमिक कर्तव्य मानना है, बल्कि शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं तक समान पहुंच सुनिश्चित करने के लिए हर संभव प्रयास करना भी है।
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