न्याय करने का मूल तत्व निष्पक्ष और न्यायसंगत होना है: उच्चतम न्यायालय
देवेंद्र सुरेश
- 25 Sep 2024, 06:20 PM
- Updated: 06:20 PM
नयी दिल्ली, 25 सितंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को कहा कि न्याय का मूल आधार निष्पक्ष और न्यायसंगत होना है तथा यह महत्वपूर्ण है कि प्रत्येक न्यायाधीश अपने झुकाव से अवगत हो।
कर्नाटक उच्च न्यायालय के न्यायाधीश वी. श्रीशानंद ने एक मामले की सुनवाई के दौरान कथित तौर पर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। उच्चतम न्यायालय ने इस मामले में स्वतः संज्ञान लेकर शुरू की गई कार्यवाही के दौरान यह टिप्पणी की।
प्रधान न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच-सदस्यीय पीठ ने कहा कि संस्था के प्रत्येक हितधारक के लिए यह समझना आवश्यक है कि न्यायिक निर्णय लेने में केवल उन्हीं मूल्यों का पालन करना चाहिए जो संविधान में निहित हैं।
पीठ में न्यायाधीश संजीव खन्ना, न्यायाधीश बी. आर. गवई, न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति हृषिकेश रॉय भी शामिल हैं।
पीठ ने कहा, ‘‘यह भी महत्वपूर्ण है कि प्रत्येक न्यायाधीश को अपने स्वयं के झुकाव के बारे में पता होना चाहिए। न्याय का मूल आधार निष्पक्ष और न्यायसंगत होना है।’’
न्यायालय ने कहा, ‘‘इस प्रक्रिया में यह आवश्यक है कि प्रत्येक न्यायाधीश अपने स्वयं के झुकाव के प्रति जागरूक रहें, क्योंकि केवल ऐसी जागरूकता के आधार पर ही हम वस्तुपरक और निष्पक्ष न्याय प्रदान करने संबंधी न्यायाधीश के मौलिक दायित्व के प्रति सच में ईमानदार हो सकते हैं।’’
पीठ ने अदालतों को ऐसी टिप्पणियां करने के प्रति आगाह किया, जिन्हें ‘‘नारी विरोधी’’ या किसी विशेष ‘‘लिंग या समुदाय’’ के प्रति दुराग्रहपूर्ण माना जा सकता है।
न्यायालय ने न्यायाधीश द्वारा की गई कथित आपत्तिजनक टिप्पणियों पर शुरू की गई कार्यवाही को बंद कर दिया तथा कहा कि न्यायमूर्ति श्रीशानंद ने 21 सितंबर को उच्च न्यायालय में खुली अदालत की सुनवाई के दौरान माफी मांग ली थी।
पीठ ने सोशल मीडिया का दौर होने और अदालत में सुनवाई के सीधा प्रसारण का उल्लेख करते हुए इस बात पर जोर दिया कि व्यक्तिगत तौर पर अदालतामें में उपस्थित न्यायाधीशों, वकीलों और वादियों पर अतिरिक्त जिम्मेदारी होती है कि वे समुदाय पर लापरवाहीपूर्ण टिप्पणियों के व्यापक प्रभाव के प्रति सचेत रहें।
कर्नाटक उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल द्वारा उसके समक्ष दायर एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए पीठ ने कहा कि उच्च न्यायालय ने एक जनवरी, 2022 से अदालत की सुनवाई की ‘लाइव-स्ट्रीमिंग’ और रिकॉर्डिंग से संबंधित नियमों को अधिसूचित किया है।
अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने कहा कि उन्हें आश्चर्य है कि क्या उच्चतम न्यायालय द्वारा उठाया गया मामला एक आंतरिक प्रक्रिया हो सकता है।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि उच्च न्यायालय के न्यायाधीश द्वारा खुद स्पष्टीकरण दिए जाने के बाद उन्हें इस मामले को और अधिक खींचने का कोई कारण नहीं दिखता।
मेहता ने कहा, ‘‘यह मेरा निजी विचार है।’’ उन्होंने कहा, ‘‘अब हम जनता की नजर में हैं और दोनों तरफ से हमें थोड़ा सतर्क रहना होगा।’’
उच्चतम न्यायालय ने 20 सितंबर को दोनों शीर्ष विधि अधिकारियों से इस मामले में सहायता करने का अनुरोध किया था।
इसने एक मामले में अदालती कार्यवाही के दौरान एक महिला वकील के खिलाफ उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की कथित आपत्तिजनक टिप्पणियों और एक अन्य मामले में बेंगलुरु के मुस्लिम बहुल क्षेत्र को ‘‘पाकिस्तान’’ कहने पर स्वत: संज्ञान लिया था।
उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल को इस विषय के संबंध में कर्नाटक उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से प्रशासनिक निर्देश प्राप्त करने के बाद एक रिपोर्ट प्रस्तुत करने को भी कहा था।
भाषा
देवेंद्र