टीएमसी अधीर के बाद बंगाल कांग्रेस के साथ करीबी संबंध चाहती है, माकपा स्थिति पर नजर रख रही है
नोमान माधव
- 23 Sep 2024, 08:31 PM
- Updated: 08:31 PM
कोलकाता, 23 सितंबर (भाषा) पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस के प्रमुख के पद से अधीर रंजन चौधरी की विदाई के बाद सत्तारूढ़ टीएमसी कांग्रेस के साथ अपने रिश्तों को मजबूत करने की जुगत में है, क्योंकि कांग्रेस के नए अध्यक्ष शुभंकर सरकार ममता बनर्जी की पार्टी के प्रति उदार नजरिया रखने के लिए जाने जाते हैं जबकि माकपा घटनाक्रम पर करीब निगाह रख रही है।
यह 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक परिदृश्य में अहम बदलाव ला सकता है।
रविवार को पदभार ग्रहण करने वाले सरकार ने पार्टी के चुनावी सहयोगियों, वाम मोर्चा और सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के साथ कांग्रेस के भविष्य के समीकरणों के बारे में सवालों को टाल दिया और इस बात पर जोर दिया कि उनका ध्यान संगठन को मजबूत करने पर है।
तीनों दल राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी ‘इंडिया’ गठबंधन का हिस्सा हैं, लेकिन कांग्रेस-वाम गठबंधन पश्चिम बंगाल में टीएमसी और भाजपा दोनों का विरोध करता है।
टीएमसी के वरिष्ठ सांसद सौगत रॉय ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, “ टीएमसी और कांग्रेस दोनों ही राष्ट्रीय स्तर पर ‘इंडिया’ गठबंधन का हिस्सा हैं। लेकिन पश्चिम बंगाल में अधीर चौधरी की वजह से दोनों दल करीब नहीं आ पाए। अब कांग्रेस का नया प्रदेश अध्यक्ष होने से हमें उम्मीद है कि कांग्रेस के साथ रिश्ते सुधरेंगे। सरकार एक बहुत ही सभ्य और परिपक्व राजनीतिक नेता हैं।”
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और टीएमसी नेता ममता बनर्जी ने बार-बार चौधरी पर “भाजपा का एजेंट” होने का आरोप लगाया है। हालांकि चौधरी इस आरोप का खंडन करते हुए दावा करते हैं कि टीएमसी राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा की “बी-टीम” के रूप में काम करती है।
टीएमसी के वरिष्ठ नेता और प्रवक्ता कृष्णु मित्रा ने कहा, “हालांकि कांग्रेस और टीएमसी स्वाभाविक सहयोगी हैं, लेकिन कांग्रेस को बंगाल में यह तय करना है कि वह किस दिशा में जाना चाहती है। पिछले कुछ चुनावों से हम तीनों - भाजपा, कांग्रेस और माकपा के खिलाफ लड़ रहे हैं और विजयी हुए हैं।”
उन्होंने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘कांग्रेस के साथ गठबंधन करके बंगाल में टीएमसी को न तो कुछ हासिल होगा और न ही कुछ नुकसान होगा। बल्कि कांग्रेस को ही फायदा होगा। अब, कांग्रेस को यह तय करना है कि क्या वह माकपा के साथ गठबंधन करके राजनीतिक रूप से अप्रासंगिक बने रहना चाहती है या राज्य की राजनीति में प्रासंगिक बनना चाहती है।’’
साल 2024 के लोकसभा चुनावों में, टीएमसी, कांग्रेस-वाम गठबंधन और भाजपा के बीच त्रिकोणीय मुकाबला हुआ था जिसमें टीएमसी को 29 सीट, भाजपा को 12 और कांग्रेस को एक सीट हासिल हुई।
टीएमसी ने लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस को राज्य में दो सीटों की पेशकश की थी, लेकिन पार्टी ने इसे अस्वीकार कर दिया और इसके बजाय माकपा के नेतृत्व वाले वाम मोर्चे के साथ अपना गठबंधन बनाए रखने का फैसला किया, जिसके साथ उसने 42 में से 12 सीटों पर चुनाव लड़ा था।
एक अन्य टीएमसी नेता ने कहा, “वैचारिक रूप से, टीएमसी और कांग्रेस दोनों अलग नहीं हैं। हम एक जैसे हैं। लेकिन बंगाल में, कांग्रेस ने माकपा को चुना, जिसके खिलाफ हमने तीन दशकों से अधिक समय तक लड़ाई लड़ी और 2011 में उसे सत्ता से बाहर किया।”
उन्होंने कहा कि टीएमसी का गठन 1998 में माकपा का विरोध करने के लिए कांग्रेस को तोड़ कर किया गया था।
चौधरी के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटने के बाद माकपा कांग्रेस के साथ अपने गठबंधन के भविष्य को लेकर सतर्क है।
माकपा के राज्य सचिव मोहम्मद सलीम ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया, “ चुनावी समझौता कांग्रेस के साथ था, किसी व्यक्ति के साथ नहीं। अगला कांग्रेस अध्यक्ष कौन बना है, यह अप्रासंगिक है। चौधरी ने वामपंथियों के साथ मिलकर बंगाल में धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक अधिकारों की लड़ाई में अहम भूमिका निभाई। हम इस बात का कयास नहीं लगा सकते कि पार्टी अब बंगाल में क्या रुख अपनाएगी।”
हालांकि, वाम मोर्चा के एक अन्य नेता ने चिंता व्यक्त की कि यदि कांग्रेस बंगाल में टीएमसी के करीब जाती है तो मौजूदा वाम-कांग्रेस गठबंधन खतरे में पड़ सकता है।
यह पूछे जाने पर कि क्या प्रदेश कांग्रेस के नए प्रमुख के आने से बंगाल में पार्टी का राजनीतिक रुख बदलेगा, कांग्रेस के एक वरिष्ठ ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि सरकार को प्रदेश प्रमुख बनाया जाना आलाकमान की ओर से इस बात का संकेत है कि वह टीएमसी को खुश रखना चाहता है।
भाषा
नोमान