पर्यावरण नियमों का उल्लंघन करने के लिए मेरठ के अस्पताल पर पांच लाख रुपये का जुर्माना
पारुल माधव
- 23 Sep 2024, 06:44 PM
- Updated: 06:44 PM
नयी दिल्ली, 23 सितंबर (भाषा) राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने पर्यावरण अधिनियमों के तहत वैधानिक मंजूरी के बिना अवैध रूप से संचालन के लिए उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले के एक अस्पताल पर पांच लाख रुपये का जुर्माना लगाया है।
एनजीटी एक पत्र याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें कहा गया था कि मेरठ में गढ़ रोड पर स्थित यशोदा अस्पताल जरूरी मंजूरी के बिना संचालित किया जा रहा है।
अधिकरण ने 20 फरवरी को मामले में एक संयुक्त समिति का गठन किया था और उसे तथ्यात्मक रिपोर्ट सौंपने को कहा था।
समिति में उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) के प्रतिनिधि, मेरठ के जिला अधिकारी, मुख्य चिकित्सा अधिकारी और जिला नगर निगम के आयुक्त शामिल थे।
हाल में पारित एक आदेश में न्यायिक सदस्य न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल और विशेषज्ञ सदस्य अफरोज अहमद की पीठ ने उस रिपोर्ट पर गौर किया, जिसके मुताबिक जिले के चिकित्सा अधिकारियों ने अस्पताल का निरीक्षण किया था और चिकित्सा विनियमों का पालन न करने के कारण उसका पंजीकरण 25 नवंबर को रद्द कर दिया गया था।
पीठ ने रिपोर्ट का जिक्र करते हुए कहा, ''चूंकि, अस्पताल बंद पड़ा हुआ था, इसलिए जल और वायु प्रदूषण की रोकथाम से जुड़े कानूनों के अनुपालन की निगरानी संयुक्त समिति द्वारा की जा सकती थी।''
अधिकरण ने अपने समक्ष पेश सबूतों को ध्यान में रखते हुए कहा कि बंद होने से पहले, अस्पताल जल (प्रदूषण की रोकथाम और नियंत्रण) अधिनियम और वायु (प्रदूषण की रोकथाम और नियंत्रण) अधिनियम के तहत वैधानिक मंजूरी के बिना संचालित किया जा रहा था।
उसने कहा, "हमें यह भी सूचित किया गया है कि अस्पताल परिसर में अपशिष्ट जल के उपचार के लिए 2 किलोलीटर प्रतिदिन (केएलडी) क्षमता का एक अपशिष्ट उपचार संयंत्र स्थापित किया गया है, लेकिन उक्त संयंत्र के लिए वैधानिक अधिकारियों से कोई सहमति नहीं ली गई। इसे देखते हुए यह स्पष्ट है कि काफी समय तक अस्पताल अवैध रूप से संचालित हो रहा था और पर्यावरण कानूनों का उल्लंघन करते हुए पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहा था।"
एनजीटी ने कहा कि अस्पताल ने वायु अधिनियम के तहत मंजूरी प्राप्त किए बिना एक डीजल जनरेटर भी स्थापित किया था।
उसने कहा, "इन तथ्यों और परिस्थितियों के मद्देनजर हमारा स्पष्ट रूप से मानना है कि परियोजना के प्रस्तावक पर 'प्रदूषक भुगतान' सिद्धांत लागू होता है और वह पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी है।"
अधिकरण ने अस्पताल को पिछले उल्लंघनों के लिए यूपीपीसीबी को दो महीने के भीतर पर्यावरणीय मुआवजे के रूप में पांच लाख रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया।
उसने कहा, "मुआवजा राशि का इस्तेमाल एक जीर्णोद्धार योजना के तहत पर्यावरण में सुधार, स्थिति बहाली और कायाकल्प के लिए किया जाएगा, जिसे एक संयुक्त समिति द्वारा एक महीने के भीतर तैयार किया जाएगा।"
भाषा पारुल