गुजरात उच्च न्यायालय ने राजकोट अग्निकांड पर राज्य सरकार के हलफनामे को खारिज किया
सुभाष माधव
- 13 Sep 2024, 08:34 PM
- Updated: 08:34 PM
अहमदाबाद, 13 सितंबर (भाषा) गुजरात उच्च न्यायालय ने राजकोट गेम जोन अग्निकांड के सिलसिले में राज्य सरकार द्वारा दाखिल एक हलफनामा शुक्रवार को खारिज करते हुए कहा कि वह गोलमोल जवाबों से आजिज़ आ गया है।
इस घटना में 27 लोगों की मौत हो गई थी।
उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश सुनीता अग्रवाल और न्यायमूर्ति प्रणव त्रिवेदी की खंड पीठ ने कहा कि सरकार द्वारा दाखिल किये गए हलफनामे में, अदालत द्वारा पिछले आदेश में उठाये गए मुद्दों के जवाब नहीं हैं।
अदालत द्वारा फटकार लगाये जाने के बाद, महाधिवक्ता कमल त्रिवेदी ने हलफनामा वापस ले लिया और आश्वासन दिया कि दो हफ्ते बाद होने वाली अगली सुनवाई में एक नया हलफनामा दाखिल किया जाएगा।
अदालत राजकोट शहर में 25 मई को हुए अग्निकांड के एक दिन बाद, स्वत: संज्ञान लेते हुए दायर की गई एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही है।
मुख्य न्यायाधीश ने अपने आदेश में कहा, ‘‘हलफनामा वापस लिए जाने के कारण खारिज किया जाता है। अदालत द्वारा 23 अगस्त के अपने आदेश में की गई टिप्पणियों पर राजकोट नगर निगम आयुक्त द्वारा नया हलफनामा दाखिल किया जाए। अगली सुनवाई 27 सितंबर को होगी।’’
पीठ ने 23 अगस्त के अपने आदेश में उल्लेख किया था कि उच्च न्यायालय ने 2020 में एक अन्य जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए, अग्नि सुरक्षा से संबंधित कुछ निर्देश जारी किए थे और राजकोट के तत्कालीन नगर आयुक्त ने 2022 में एक हलफनामे के माध्यम से पुष्टि की थी कि वह इस अदालत द्वारा समय-समय पर जारी किये गए निर्देशों का पालन करेंगे।
शुक्रवार को जब मामले की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने राज्य सरकार के हलफनामे पर आपत्ति जताते हुए कहा कि पिछले आदेश में उठाए गए मुद्दों के बारे में इसमें कोई विवरण नहीं है।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा, ‘‘नगर निगम आयुक्त यह कहकर बच नहीं सकते कि उन्हें (गेम जोन के अवैध निर्माण के बारे में) जानकारी नहीं थी।’’
कमल त्रिवेदी ने कहा, ‘‘नये हलफनामे में बताया गया है कि नगर निगम कैसे काम करता है। इसमें दर्शाया गया है कि वह (आयुक्त) निगरानी कर रहे हैं। केवल यह बताने की कोशिश की गई है कि मेरी ओर से कोई लापरवाही नहीं की गई।’’
इस पर पीठ ने कहा कि मामला आग लगने की घटना से जुड़ा है, नगर निगम कैसे काम करता है, इस बारे में नहीं।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा, ‘‘क्या आप इस तरह से अपने काम को सही ठहरा रहे हैं? हमने आपसे केवल जवाब दाखिल करने को कहा था। आपको पिछले आदेश में उल्लेखित हमारी टिप्पणियों का जवाब देने की जरूरत है। कृपया औचित्य सिद्ध करना बंद करें। हम अधिकारियों के इन टालमटोल वाले हलफनामों से आजिज़ आ चुके हैं। हम इस हलफनामे को स्वीकार नहीं कर रहे हैं।’’
पीठ ने कहा कि किसी को भी अदालत के आदेश को दरकिनार करने और फिर यह कहकर बच निकलने की अनुमति नहीं दी जा सकती कि उसने अपने अधीनस्थों को काम सौंपा था इसलिए वह निर्दोष है। उसे जिम्मेदारी लेनी होगी।
उच्च न्यायालय ने कहा कि उसे इस अदालत में माफी का हलफनामा प्रस्तुत करना चाहिए। उसे जवाब देना चाहिए कि उसे कर्तव्य में लापरवाही के लिए क्यों जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए।
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