संसदीय सुधारों की जरूरत, पीठासीन अधिकारी न्यायपालिका से लाने पर विचार हो: तिवारी
हक हक माधव
- 30 Aug 2024, 06:00 PM
- Updated: 06:00 PM
नयी दिल्ली, 30 अगस्त (भाषा) कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मनीष तिवारी ने संसद के दोनों सदनों में आसन और विपक्षी सांसदों के बीच अक्सर होने वाली नोकझोंक की पृष्ठभूमि में कहा है कि गहन संसदीय सुधारों की आवश्यकता है तथा शीर्ष न्यायपालिका से अस्थायी आधार पर पीठासीन अधिकारियों की सेवा लेने पर विचार किया जा सकता है।
तिवारी ने कहा कि इस तरह की घटनाएं दुर्भाग्यपूर्ण हैं और यह लोकतांत्रिक व्यवस्था में पीठासीन अधिकारियों की भूमिका पर फिर से विचार करने की जरूरत है।
उन्होंने ‘पीटीआई’ के विशेष कार्यक्रम ‘@4 पार्लियामेंट स्ट्रीट’ में समाचार एजेंसी के संपादकों के साथ बातचीत में कहा, ‘‘लोकसभा अध्यक्ष एक विशेष राजनीतिक दल से होते हैं और यदि उन्हें फिर से निर्वाचित होना है तो उन्हें अपने राजनीतिक दल से टिकट मांगना होगा। आप चाहे कितना भी ईमानदार और निष्पक्ष होने का प्रयास करें, लेकिन खुद का अस्तित्व बनाए रखने की एक स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है।’’
तिवारी का कहना था कि ब्रिटेन में वर्तमान स्पीकर को दोबारा चुनाव से गुजरना नहीं पड़ता क्योंकि कोई भी उसके खिलाफ उम्मीदवार नहीं खड़ा करता है, यह उसे पक्षपातपूर्ण होने के दाग से मुक्त करता है। यह एक अलिखित परंपरा है जो स्पीकर को संसदीय कार्यवाही के रूप में कहीं अधिक निष्पक्ष भूमिका निभाने में सुविधा प्रदान करती है।
उन्होंने कहा, ‘‘दुर्भाग्य से, हमने भारत में ये परिपाटी नहीं ली है। इसलिए उन परिस्थितियों में पीठासीन अधिकारियों के चयन या चयन के पूरे तरीके पर पुनर्विचार करने का समय आ गया है। शायद समय आ गया है कि शीर्ष न्यायपालिका के पीठासीन अधिकारियों को एक विशेष अवधि के लिए दूसरे पद पर नियुक्त किया जाने पर विचार हो।’’
चंडीगढ़ से लोकसभा सदस्य ने कहा, ‘‘हर कोई आसन का सम्मान करता है, लेकिन इसके साथ-साथ यह भी जरूरी है कि उसे स्वतंत्र रूप से और निडर होकर अपनी बात रखने का मौका दिया जाए।’’
संसद के दोनों सदनों में आसन और विपक्षी सांसदों के बीच बार-बार गतिरोध की पृष्ठभूमि में तिवारी ने यह टिप्पणी की है।
पिछले मानसून सत्र में ऐसी खबरें आई थीं कि विपक्ष राज्यसभा के सभापति एवं उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ को उनके ‘‘पक्षपातपूर्ण रवैये’’ का हवाला देते हुए उन्हें पद से हटाने के लिए एक प्रस्ताव लाने पर विचार कर रहा है।
संसद में चर्चा के बजाय व्यवधान आम बात होने के बारे में पूछे जाने पर तिवारी ने कहा कि व्यवधान कोई ऐसी घटना नहीं है जो पिछले 10 वर्षों तक ही सीमित हो।
उनका कहना था, ‘‘मुझे याद है कि 2004 और 2014 के बीच (संप्रग सरकार के दौरान) यह (व्यवधान) अपवाद से कहीं अधिक आम बात बन गयी थी। संसद के पूरे सत्र को बर्बाद कर दिया गया था। यह दुर्भाग्यपूर्ण है लेकिन भारतीय संसदीय प्रणाली बहुत लंबे समय से उसी रास्ते पर चल रही है।’’
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