नया जलवायु वित्त लक्ष्य प्राप्त नहीं होने पर पेरिस समझौता खतरे में पड़ जाएगा: एलएमडीसी प्रवक्ता
आशीष सुभाष
- 21 Aug 2024, 08:15 PM
- Updated: 08:15 PM
(गौरव सैनी)
नयी दिल्ली, 21 अगस्त (भाषा) समान विचारधारा वाले विकासशील देशों (एलएमडीसी) के प्रवक्ता ने चेतावनी दी है कि विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन से निपटने और अनुकूलन में मदद के लिए एक सार्थक नया जलवायु वित्त लक्ष्य देने में नाकाम रहने पर पेरिस समझौता खतरे में पड़ जाएगा।
एलएमडीसी करीब 25 विकासशील देशों का एक समूह है जो अंतरराष्ट्रीय जलवायु वार्ताओं में साझा दृष्टिकोण की वकालत करता है। इस समूह में भारत, चीन, पाकिस्तान, अर्जेंटीना, ईरान और मिस्र शामिल हैं तथा यह दुनिया की 50 प्रतिशत से अधिक आबादी का प्रतिनिधित्व करता है।
एलएमडीसी के प्रवक्ता और बोलीविया के प्रमुख वार्ताकार डिएगो पचेको ने ‘पीटीआई-भाषा’ के साथ डिजिटल साक्षात्कार में कहा कि विकसित देश जटिल किस्म के नया सामूहिक परिमाणित लक्ष्य (एनसीक्यूजी) फ्रेमवर्क का निर्माण कर जलवायु वित्त प्रदान करने की अपनी जिम्मेदारी से बचने का प्रयास कर रहे हैं।
एनसीक्यूजी से आशय उस नयी, बड़ी राशि से है जिसे विकसित देशों को विकासशील देशों में जलवायु कार्रवाई का समर्थन करने के लिए 2025 से शुरू कर प्रत्येक वर्ष जुटाना होगा। संभावना है कि इस पहल में शामिल देश इस वर्ष नवंबर में अजरबैजान के बाकू में आयोजित होने वाले संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन सीओपी29 में एनसीक्यूजी को अंतिम रूप देंगे।
पचेको ने कहा कि विकासशील देश पेरिस समझौते के लक्ष्यों या राष्ट्रीय लक्ष्य (एनडीसी) को प्राप्त करने के लिए अपनी राष्ट्रीय जलवायु योजनाओं को उन विकसित देशों से ‘‘बिना किसी समर्थन’’ के लागू कर रहे हैं, जिन्हें ऐतिहासिक रूप से औद्योगीकरण से लाभ मिला है और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में जिनकी सबसे अधिक हिस्सेदारी रही है।
उन्होंने कहा, ‘‘विकासशील देश आवश्यक वित्तीय सहायता के बिना अधिक प्रतिबद्धताओं के साथ आगे नहीं बढ़ सकते। पेरिस समझौते को मंजूरी मिलने के 10 साल बाद, इस समझौते के कार्यान्वयन के लिए प्रमुख मुद्दे पर चर्चा करने का समय आ गया है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘यदि हम सार्थक एनसीक्यूजी हासिल करने में सफल नहीं हो पाते हैं, तो पेरिस में किए गए सभी समझौते दांव पर लग जाएंगे।’’
एलएमडीसी के प्रवक्ता ने कहा कि ‘ग्लोबल साउथ’ एक दशक से जलवायु संकट से निपटने के लिए अधिक सहयोग का आह्वान कर रहा है ‘‘लेकिन ऐसा लगता है कि विकसित देश वास्तव में इस पर जवाब नहीं देना चाहते, वे सिर्फ अपनी अर्थव्यवस्थाओं की रक्षा कर रहे हैं।’’
जलवायु परिवर्तन पर 1992 के संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (यूएनएफसीसीसी) के अनुसार, अमीर औद्योगिक राष्ट्र विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन से निपटने और अनुकूलन में मदद करने के लिए वित्त और प्रौद्योगिकी प्रदान करने को लेकर जिम्मेदार हैं। इन देशों में अमेरिका, कनाडा, जापान, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और जर्मनी, फ्रांस जैसे यूरोपीय संघ (ईयू) के सदस्य देश तथा ब्रिटेन शामिल हैं।
कोपेनहेगन में 2009 के संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन में, विकसित देशों ने विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने और उससे निपटने में मदद करने के लिए 2020 से प्रतिवर्ष 100 अरब अमेरिकी डॉलर देने संकल्प जताया था।
हालांकि, यह लक्ष्य पूरी तरह से पूरा नहीं हुआ है, जिससे वित्तीय अंतराल काफी बढ़ गया है। इस कमी ने विकासशील देशों में भरोसा खत्म कर दिया है और जलवायु कार्रवाई में बाधा उत्पन्न की है। एलएमडीसी इस अंतर को पाटने के लिए तत्काल कार्रवाई की मांग कर रहा है।
भाषा आशीष