वास्तविक बदलाव के लिए एक और बलात्कार या हत्या की घटना का इंतजार नहीं कर सकते : न्यायालय
प्रशांत माधव
- 20 Aug 2024, 05:05 PM
- Updated: 05:05 PM
नयी दिल्ली, 20 अगस्त (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को स्वास्थ्य देखभाल संस्थानों में सुरक्षा की कमी पर चिंता व्यक्त की और कहा कि देश जमीनी स्तर पर वास्तविक बदलाव के लिए एक और बलात्कार या हत्या की घटना का इंतजार नहीं कर सकता।
न्यायालय कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में एक स्नातकोत्तर चिकित्सक के कथित बलात्कार और हत्या से संबंधित स्वतः संज्ञान मामले की सुनवाई कर रहा था।
प्रधान न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने कहा कि इस घटना के बाद देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों ने डॉक्टरों के लिए संस्थागत सुरक्षा की कमी के मुद्दे पर सबका ध्यान खींचा है।
अदालत ने कहा कि चिकित्सा संघों ने लगातार इस मुद्दे को उठाया है तथा इस ओर ध्यान दिलाया कि अपने कर्तव्यों के निर्वहन में चिकित्सा पेशेवर विभिन्न प्रकार की हिंसा का दुर्भाग्यपूर्ण निशाना बनते हैं।
पीठ में न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा भी शामिल हैं। पीठ ने कहा, “समानता का संवैधानिक मूल्य इसके अलावा और कुछ नहीं मांगता तथा दूसरों को स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने वालों (चिकित्सक) के स्वास्थ्य, कल्याण और सुरक्षा के साथ समझौता बर्दाश्त नहीं करेगा। देश जमीनी स्तर पर वास्तविक बदलाव के लिए (एक और) बलात्कार या हत्या (की घटना) का इंतजार नहीं कर सकता।”
न्यायालय ने कहा कि अस्पताल और अन्य स्वास्थ्य सुविधाएं चौबीसों घंटे खुली रहती हैं और ऐसे संस्थानों के हर हिस्से में किसी की भी बेरोकटोक पहुंच के कारण स्वास्थ्य पेशेवरों के साथ हिंसा की आशंका बनी रहती है।
उसने कहा, “पीड़ित मरीजों के रिश्तेदार अप्रिय नतीजों को मेडिकल पेशेवरों की लापरवाही का परिणाम बताते हैं। ऐसे आरोपों के तुरंत बाद मेडिकल पेशेवरों के खिलाफ हिंसा की घटनाएं होती हैं।”
चिकित्सा पेशेवरों के खिलाफ हिंसा की कई घटनाओं का उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा कि ये अस्पतालों में डॉक्टरों, नर्सों और पैरा-मेडिकल स्टाफ की सुरक्षा में प्रणालीगत विफलता के संकेत हैं।
पीठ ने कहा, “अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कुछ या बिना किसी सुरक्षात्मक प्रणाली के, चिकित्सा पेशेवर हिंसा के प्रति संवेदनशील हो गए हैं। पूरे देश में स्वास्थ्य सेवा के लिए प्रणालीगत मुद्दों को देखते हुए, इस न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़ा है।”
अदालत ने कहा कि इन परिस्थितियों में महिलाओं को यौन और गैर-यौन हिंसा का विशेष तौर पर खतरा रहता है।
न्यायालय ने कहा, “इसके अलावा, महिला चिकित्सा पेशेवरों को कार्यस्थल पर सहकर्मियों, वरिष्ठों और अधिकारियों द्वारा विभिन्न प्रकार की यौन हिंसा का भी सामना करना पड़ता है। यौन हिंसा की जड़ें संस्था के भीतर भी रही हैं, अरुणा शानबाग का मामला इसका एक उदाहरण है।”
पीठ ने कहा, “...चिकित्सा प्रतिष्ठानों में चिकित्सा पेशेवरों के खिलाफ हिंसा और यौन हिंसा दोनों के खिलाफ संस्थागत सुरक्षा मानदंडों की कमी गंभीर चिंता का विषय है।”
न्यायालय ने कहा कि कई राज्यों ने स्वास्थ्य सेवा पेशेवरों को हिंसा और संपत्ति को नुकसान से बचाने के लिए कानून बनाए हैं और ये सभी कानून चिकित्सा पेशेवरों के खिलाफ हिंसा के किसी भी कृत्य को प्रतिबंधित करते हैं।
पीठ ने कहा, “यह अपराध गैर-जमानती है और इसके लिए तीन वर्ष के कारावास का प्रावधान है। हालांकि, ये कानून समस्या के मूल में मौजूद संस्थागत और प्रणालीगत कारणों का निराकरण नहीं करते हैं। संस्थागत सुरक्षा मानकों में सुधार किए बिना सजा बढ़ाने से समस्या का प्रभावी ढंग से समाधान नहीं हो पाता है।”
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