सरकार ने यूपीएससी को ‘लेटरल एंट्री’ से संबंधित विज्ञापन रद्द करने का निर्देश दिया
जोहेब अविनाश
- 20 Aug 2024, 04:02 PM
- Updated: 04:02 PM
नयी दिल्ली, 20 अगस्त (भाषा) केंद्र सरकार ने विवाद के बीच मंगलवार को संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) को नौकरशाही में ‘लेटरल एंट्री’ से संबंधित नवीनतम विज्ञापन वापस लेने का निर्देश दिया।
यूपीएससी ‘लेटरल एंट्री’ के जरिए सीधे उन पदों पर उम्मीदवारों की नियुक्ति करता है, जिन पर भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के अधिकारियों की तैनाती होती है। इस व्यवस्था के तहत निजी क्षेत्रों के अलग-अलग पेशे के विशेषज्ञों को विभिन्न मंत्रालयों व विभागों में सीधे संयुक्त सचिव और निदेशक व उप सचिव के पद पर नियुक्त किया जाता है।
केंद्रीय कार्मिक राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने संघ लोक सेवा आयोग की अध्यक्ष प्रीति सूदन को पत्र लिखकर विज्ञापन रद्द करने को कहा “ताकि कमजोर वर्गों को सरकारी सेवाओं में उनका उचित प्रतिनिधित्व मिल सके।”
यूपीएससी ने 17 अगस्त को ‘लेटरल एंट्री’ के माध्यम से 45 संयुक्त सचिवों, निदेशकों और उप सचिवों की भर्ती के लिए अधिसूचना जारी की थी। सरकारी विभागों में (निजी क्षेत्रों के विशेषज्ञों सहित) विभिन्न विशेषज्ञों की नियुक्ति को ‘लेटरल एंट्री’ कहा जाता है।
इस निर्णय की विपक्षी दलों ने कड़ी आलोचना की थी। उनका दावा है कि इससे अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के आरक्षण अधिकारों का हनन हुआ है।
केंद्रीय कार्मिक राज्य मंत्री सिंह ने अपने पत्र में कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए सार्वजनिक रोजगार में आरक्षण "हमारे सामाजिक न्याय ढांचे की आधारशिला है जिसका उद्देश्य ऐतिहासिक अन्याय को दूर करना और समावेशिता को बढ़ावा देना है।"
सिंह ने कहा, "चूंकि इन पदों को विशिष्ट मानते हुए एकल-कैडर पद के रूप में नामित किया गया है, इसलिए इन नियुक्तियों में आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है। सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के माननीय प्रधानमंत्री के दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए, इस कदम की समीक्षा और सुधार की आवश्यकता है।"
उन्होंने कहा, "मैं यूपीएससी से 17 अगस्त 2024 को जारी लेटरल एंट्री भर्ती विज्ञापन को रद्द करने का आग्रह करता हूं।" सिंह ने कहा कि यह कदम सामाजिक न्याय और सशक्तीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रगति होगा।
उन्होंने कहा, “यह सर्वविदित है कि सैद्धांतिक रूप में लेटरल एंट्री को द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग का समर्थन हासिल था, जिसका गठन 2005 में श्री वीरप्पा मोइली की अध्यक्षता में किया गया था। 2013 में छठे वेतन आयोग की सिफारिशें भी इसी दिशा में थीं।”
उन्होंने कहा कि इससे पहले और बाद में भी ‘लेटरल एंट्री’ के कई बड़े मामले सामने आए हैं।
सिंह ने कहा कि पिछली सरकारों के तहत विभिन्न मंत्रालयों में सचिव जैसे महत्वपूर्ण पद, यूआईडीएआई का नेतृत्व आदि, बिना किसी आरक्षण प्रक्रिया का पालन किए, ‘लेटरल एंट्री’ के माध्यम से भरे गए।
उन्होंने कहा, “इसके अलावा, यह सर्वविदित है कि राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के ‘कुख्यात’ सदस्य एक सुपर-नौकरशाही की अगुवाई करते थे जो प्रधानमंत्री कार्यालय को नियंत्रित करती थी।”
मंत्री ने कहा कि 2014 से पहले अधिकांश प्रमुख ‘लेटरल एंट्री’ तदर्थ तरीके से की गई थीं, जिनमें कथित पक्षपात के मामले भी सामने आए थे।
मंत्री ने कहा, “हमारी सरकार का प्रयास इस प्रक्रिया को संस्थागत रूप से संचालित, पारदर्शी व मुक्त बनाना रहा है।”
उन्होंने कहा कि इसके अलावा, प्रधानमंत्री का दृढ़ विश्वास है कि ‘लेटरल एंट्री’ की प्रक्रिया को संविधान में निहित समानता और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों विशेष रूप से आरक्षण के प्रावधानों के साथ जोड़ा जाना चाहिए।
भाषा जोहेब