मामले में तेजी से सुनवाई के आदेश का पालन न करने पर उच्च न्यायालय ने मजिस्ट्रेट पर नाराजगी जताई
प्रशांत मनीषा
- 20 Aug 2024, 03:38 PM
- Updated: 03:38 PM
मुंबई, 20 अगस्त (भाषा) बंबई उच्च न्यायालय ने दहेज उत्पीड़न के एक मामले में मुकदमे की सुनवाई में तेजी लाने के निर्देश संबंधी उसके 2021 के आदेश का पालन नहीं करने पर एक मजिस्ट्रेट के प्रति कड़ी नाराजगी जाहिर की और कहा कि आदेश का पालन न करने के लिए उनके बहाने “कमजोर” हैं।
न्यायमूर्ति ए.एस. गडकरी और न्यायमूर्ति नीला गोखले की एक खंडपीठ ने नौ अगस्त के अपने आदेश में कहा कि नवी मुंबई न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत की अध्यक्षता कर रहीं मजिस्ट्रेट ने उच्च न्यायालय के निर्देशों का बिल्कुल भी सम्मान नहीं किया और ऐसा प्रतीत हुआ कि वह अपना काम करने में गंभीर नहीं थीं।
आदेश की प्रति मंगलवार को उपलब्ध करायी गयी।
पीठ ने कहा कि मजिस्ट्रेट ने निर्धारित अवधि के भीतर सुनवाई पूरी न करने के लिए केवल बहाने बनाए हैं।
मामला वैवाहिक विवाद और दहेज उत्पीड़न से जुड़ा है।
अदालत ने कहा, “हम न्यायिक अधिकारी द्वारा इस न्यायालय से जारी निर्देशों का पालन न करने तथा उनका सम्मान न करने के लिए बताए गए कमजोर बहाने को स्वीकार करने में असमर्थ हैं। हमें ऐसा प्रतीत होता है कि न्यायिक अधिकारी अपने न्यायिक कार्य को करने में गंभीर नहीं है।”
पीठ ने निर्देश दिया कि मजिस्ट्रेट की रिपोर्ट सहित मामले को उचित निर्देशों के लिए उच्च न्यायालय की प्रशासनिक समिति के समक्ष रखा जाए।
यह आदेश दहेज उत्पीड़न के एक मामले का सामना कर रहे एक व्यक्ति द्वारा दायर आवेदन पर पारित किया गया, जिसमें दावा किया गया कि 2021 में उच्च न्यायालय द्वारा मुकदमे में तेजी लाने के निर्देश के बावजूद, मजिस्ट्रेट ने अभी तक मुकदमे की सुनवाई पूरी नहीं की है।
फरवरी 2021 में, उच्च न्यायालय ने संबंधित मजिस्ट्रेट अदालत को मुकदमे में तेजी लाने और चार महीने के भीतर अपना फैसला देने का निर्देश दिया।
यह आदेश उस व्यक्ति द्वारा दायर याचिका पर पारित किया गया, जिसने मामले में आरोप मुक्त करने की मांग की थी। मुकदमे में तेजी लाने के आदेश के बाद व्यक्ति ने अपनी याचिका वापस ले ली।
इस वर्ष जुलाई में उच्च न्यायालय ने संबंधित मजिस्ट्रेट से रिपोर्ट तलब करते हुए पूछा था कि 2021 में पारित निर्देशों का पालन क्यों नहीं किया गया।
पीठ ने नौ अगस्त को मजिस्ट्रेट द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट का अवलोकन किया, जिसमें उन्होंने दावा किया था कि मामला उनके समक्ष जनवरी 2023 में ही रखा गया था और उस समय लिपिक ने उन्हें यह नहीं बताया था कि उच्च न्यायालय ने मामले को समयबद्ध कर दिया है।
मजिस्ट्रेट ने आगे दावा किया कि वह एक दशक से लंबित मामलों की एक बड़ी संख्या से निपट रही थीं और उन्हें प्रत्येक मामले पर प्राथमिकता के आधार पर ध्यान देना था।
रिपोर्ट में आगे कहा गया कि उच्च न्यायालय के आदेश का पालन न करने के लिए स्टाफ की कमी जिम्मेदार है। मजिस्ट्रेट ने सुनवाई पूरी करने के लिए छह महीने का समय मांगा।
उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि भले ही मामला पहली बार 2023 में मजिस्ट्रेट के समक्ष रखा गया था, लेकिन उन्होंने इसके शीघ्र निपटान के लिए आवश्यक कदम नहीं उठाए।
भाषा प्रशांत