केंद्र ने ‘तीन तलाक’ पर 2019 के कानून का उच्चतम न्यायालय में बचाव किया
सुभाष माधव
- 19 Aug 2024, 10:17 PM
- Updated: 10:17 PM
नयी दिल्ली, 19 अगस्त (भाषा) केंद्र ने उच्चतम न्यायालय में कहा है कि ‘तीन तलाक’ ने पत्नियों के परित्याग को वैध और संस्थागत बना दिया। इसने इस प्रथा को अपराध की श्रेणी में डालने वाले 2019 के कानून का शीर्ष अदालत में बचाव किया और अनुरोध किया कि इसे चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया जाए।
इस कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं के जवाब में न्यायालय में दाखिल एक हलफनामे में, भारत संघ (केंद्र) ने कहा कि शीर्ष अदालत द्वारा 2017 में इस प्रथा को निरस्त करने के बावजूद, यह समुदाय के सदस्यों के बीच ‘‘इस प्रथा के तहत दिये जाने वाले तलाक की संख्या में कमी लाने में पर्याप्त निवारक के रूप में काम नहीं कर पाया है।’’
हलफनामे में कहा गया है कि संसद ने ‘तीन तलाक’ से पीड़ित विवाहित मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए अपने विवेक से यह अधिनियम पारित किया है।
इसमें कहा गया है, ‘‘यह अधिनियम विवाहित मुस्लिम महिलाओं के लैंगिक न्याय और लैंगिक समानता के वृहद संवैधानिक लक्ष्यों को सुनिश्चित करने में मदद करता है और गैर-भेदभाव एवं सशक्तीकरण के उनके मौलिक अधिकार पाने में मदद करता है।’’
हलफनामे में कहा गया है कि भले ही उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ ने ‘तीन तलाक’ को ‘‘असंवैधानिक’’ करार दिया है, लेकिन देश के विभिन्न हिस्सों में अब भी इस तरह से तलाक दिये जाने की खबरें हैं।
केंद्र ने कहा, ‘‘यह देखा गया है कि माननीय न्यायालय द्वारा तलाक-ए-बिद्दत को निरस्त करना, कुछ मुसलमानों में इस प्रथा के तहत तलाक की संख्या में कमी लाने में पर्याप्त निवारक नहीं साबित हुआ है।’’
केंद्र ने कहा, ‘‘इसलिए, यह महसूस किया गया कि इस माननीय न्यायालय के आदेश को प्रभावी बनाने और अवैध तलाक के पीड़ितों की शिकायतों का निवारण करने के लिए सरकार द्वारा कार्रवाई की आवश्यकता है और अंततः कानून बनाया गया।’’
केंद्र सरकार ने उल्लेख किया कि शीर्ष अदालत ने लगातार यह माना है कि न्यायालय उपाय की बुद्धिमत्ता पर विचार नहीं कर सकता, बल्कि केवल कानून की संवैधानिकता पर विचार कर सकता है।
हलफनामे में कहा गया है, ‘‘इसी प्रकार, न्यायालय का उद्देश्य केवल कानून की व्याख्या करना और यदि वह वैध है, तो उसे लागू करना है, तथा इस बात पर चर्चा नहीं करना है कि कानून क्या होना चाहिए।’’
हलफनामे में कहा गया है, ‘‘माननीय न्यायालय ने बार-बार यह स्वीकार किया है और इसे बरकरार रखा है कि यह निर्धारित करना अकेले संसद का कार्य है कि देश के लोगों के लिए क्या अच्छा और उचित है और क्या नहीं है। साथ ही, उन्हें अपनी शक्तियों की सीमा के भीतर अपने काम करने की पूरी छूट दी जानी चाहिए, अन्यथा सभी प्रगति अवरुद्ध हो जाएगी।’’
केंद्र ने दलील दी कि जब उच्चतम न्यायालय ने खुद तलाक-ए-बिद्दत की प्रथा को रद्द कर दिया है, तो अदालत को विधायी अधिनियम में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
केंद्र ने कहा, ‘‘इस प्रकार, उक्त अधिनियम इस माननीय न्यायालय द्वारा निर्धारित निर्णय को लागू करने के लिए संसद द्वारा बनाए गए कानून का एक हिस्सा है। इसे ध्यान में रखते हुए, रिट याचिका तत्काल खारिज किए जाने योग्य है।’’
उच्चतम न्यायालय ने 22 अगस्त 2017 को, एक बार में कहकर दिए जाने वाले तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) को असंवैधानिक घोषित कर दिया था। उच्चतम न्यायालय 23 अगस्त 2019 को मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 2019 की वैधता की पड़ताल करने के लिए सहमत हो गया।
कानून का उल्लंघन करने पर तीन साल तक की कैद हो सकती है। दो मुस्लिम संगठनों जमीयत उलेमा-ए-हिंद और समस्त केरल जमीयत-उल उलेमा ने अदालत से कानून को ‘‘असंवैधानिक’’ घोषित करने का आग्रह किया है।
जमीयत ने अपनी याचिका में दावा किया कि ‘‘एक विशेष धर्म में तलाक के तरीके को अपराध घोषित करना, जबकि अन्य धर्मों में विवाह और तलाक के विषय को केवल नागरिक कानून के दायरे में रखना, भेदभाव को जन्म देता है, जो अनुच्छेद 15 की भावना के अनुरूप नहीं है।’’
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