कैदियों की टेलीफोन सुविधा रोकने के खिलाफ दायर याचिका पर दिल्ली सरकार और एनआईए को नोटिस
अमित संतोष
- 10 Aug 2024, 05:27 PM
- Updated: 05:27 PM
नयी दिल्ली, 10 अगस्त (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने आतंकवाद के वित्तपोषण मामले के एक आरोपी की याचिका पर दिल्ली सरकार और राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) से जवाब मांगा है। आरोपी ने यह याचिका उस परिपत्र को रद्द करने का अनुरोध करते हुए दायर की है जो जांच एजेंसी से अनापत्ति प्रमाण पत्र के बिना कैदियों को ई-मुलाकात और टेलीफोन सुविधा की अनुमति नहीं देता।
ऑडियो-सह-वीडियो ई-मुलाकात कैदी को दी जाने वाली फोन कॉल सुविधा का ही विस्तार है।
जेल प्राधिकारियों द्वारा इस साल अप्रैल में जारी किया गया यह परिपत्र दिल्ली जेल नियम के नियम 631 के अंतर्गत आने वाले कैदियों से संबंधित है। इस नियम के अंतर्गत राज्य के खिलाफ अपराध, आतंकवादी गतिविधियों और जघन्य अपराधों में शामिल होने के आरोपी आते हैं। इसके अलावा महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम, राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम और लोक सुरक्षा अधिनियम जैसे कानूनों के तहत दर्ज मामलों के आरोपी भी इस नियम के तहत आते हैं।
न्यायमूर्ति संजीव नरूला ने मासाससोंग एओ द्वारा दायर याचिका पर दिल्ली सरकार और एनआईए को नोटिस जारी किया। इस याचिका में परिपत्र को रद्द करने और प्राधिकारियों को ई-मुलाकात और टेलीफोन सुविधा बहाल करने या उपलब्ध कराने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया है।
मासाससोंग की ओर से पेश हुए अधिवक्ता एम एस खान ने कहा कि फरवरी 2020 में गिरफ्तार और तिहाड़ जेल में बंद याचिकाकर्ता को जेल से हर दिन पांच मिनट के लिए अपने नाबालिग बेटे और बेटी को फोन करने की अनुमति दी गई थी।
उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता के वृद्ध माता-पिता हैं जो अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर हैं और अपनी उम्र से संबंधित बीमारियों से जूझ रहे हैं। खान ने कहा कि वह अपने माता-पिता और बच्चों के कल्याण के बारे में बहुत चिंतित है और संचार सुविधाएं ही उनके लिए एकमात्र सांत्वना हैं।
याचिका में कहा गया है, "याचिकाकर्ता को प्रदान की गई संचार सुविधाओं को बंद करना न केवल दिल्ली जेल नियम, 2018 के प्रावधानों का बल्कि संबंधित परिपत्रों का भी उल्लंघन है। इसके अलावा, प्रतिवादियों की ओर से याचिकाकर्ता को उपलब्ध सुविधाओं को वापस लेने/बंद करने का कोई कारण नहीं बताया गया है, जो कैदियों को अपने प्रियजनों से संवाद करने की अनुमति देने के उद्देश्य से शुरू की गई थीं।"
याचिका में कहा गया है कि परिपत्र संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करता है क्योंकि विचाराधीन कैदी का अपने परिवार और वकील से संवाद करने का अधिकार मौलिक अधिकारों का एक अनिवार्य घटक है।
याचिका में कहा गया है कि परिपत्र और अधिकारियों की ओर से की गई कार्रवाई बिना किसी उचित वर्गीकरण या औचित्य के कैदियों के साथ भेदभाव करती है।
जेल नियमों के अनुसार, नियम 631 के तहत आने वाले कैदी लोक सुरक्षा और व्यवस्था के हित में संचार सुविधा के लिए पात्र नहीं हैं। नियमों में कहा गया है कि जेल अधीक्षक को उप महानिरीक्षक (रेंज) की पूर्व स्वीकृति के साथ व्यक्तिगत मामले के आधार पर उचित निर्णय लेने का अधिकार होगा।
परिपत्र के अनुसार, दिल्ली जेल नियम, 2018 के नियम 631 के तहत आने वाले कैदियों और उच्च सुरक्षा वार्ड में बंद कैदियों को भी संबंधित अभियोजन एजेंसियों से अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) या अनुमोदन प्राप्त करने के बाद ही कैदी फोन कॉल सुविधा की अनुमति दी जा सकती है।
इसमें कहा गया है कि जेल अधीक्षक कैदी द्वारा जेल से ऐसी सुविधा के लिए एनओसी/अनुमोदन के लिए दिए गए लैंडलाइन/मोबाइल नंबर अभियोजन एजेंसी को उपलब्ध कराएंगे।
परिपत्र में कहा गया है कि ई-मुलाकात सुविधा कैदी फोन कॉल सुविधा का विस्तार है, जो उच्च स्तर पर है और इसलिए, सुरक्षा खतरे या कैदी द्वारा या ई-मुलाकात के माध्यम से उसके आगंतुकों द्वारा ऐसी सुविधा के किसी अन्य दुरुपयोग को ध्यान में रखते हुए अधिक जांच या एहतियात की आवश्यकता है।
बाद में परिपत्र में एक परिशिष्ट जारी किया गया और इसमें कहा गया कि जो कैदी 22 अप्रैल, 2024 को या उससे पहले ई-मुलाकात/टेलीफोन सुविधा का लाभ उठा रहे हैं, उनके लिए यह सुविधा तब तक लागू रहेगी जब तक कि जांच एजेंसियों से एनओसी प्राप्त नहीं हो जाती।
भाषा अमित