न्यायालय ने 2022 के पीएमएलए फैसले को लेकर पुनर्विचार संबंधी याचिकाओं पर सुनवाई टाली
आशीष पवनेश
- 07 Aug 2024, 10:01 PM
- Updated: 10:01 PM
नयी दिल्ली, सात अगस्त (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को इस सवाल पर सुनवाई 28 अगस्त तक टाल दी कि क्या धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत गिरफ्तारी और संपत्ति कुर्क करने की प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की शक्तियों को बरकरार रखने वाले उसके 2022 के फैसले पर पुनर्विचार की आवश्यकता है।
सुनवाई शुरू होते ही ईडी की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति सी टी रविकुमार और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ से कहा कि पुनर्विचार याचिकाएं अचानक सूचीबद्ध की गई हैं और उन्हें कुछ समय चाहिए।
मेहता ने पीठ से कहा, ‘‘इन्हें अचानक सूचीबद्ध किया गया है। हमें तैयारी के लिए कुछ समय चाहिए। हमें पता चला कि मामले को बीती देर रात सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है। कृपया इस पर बाद की तारीख में सुनवाई करें।’’
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि 2022 का फैसला गलत है और इस पर पुनर्विचार की जरूरत है।
शीर्ष अदालत ने सुनवाई स्थगित करने पर सहमति जताते हुए पक्षकारों को आश्वासन दिया कि वह मामले पर बहस करने के लिए पर्याप्त समय देगी। इसके साथ ही पीठ ने सुनवाई 28 अगस्त तक के लिए स्थगित कर दी।
अदालत कुछ मानदंडों के आधार पर तीन न्यायाधीशों की पीठ के 27 जुलाई, 2022 के फैसले को लेकर पुनर्विचार के अनुरोध वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी।
उच्चतम न्यायालय ने 2022 के अपने फैसले में पीएमएलए के तहत धन शोधन में शामिल संपत्ति की तलाशी और जब्ती तथा गिरफ्तारी के सबंध में ईडी की शक्तियों को बरकरार रखा था।
अगस्त 2022 में, शीर्ष अदालत ने जुलाई 2022 के अपने फैसले पर पुनर्विचार के अनुरोध वाली याचिका पर सुनवाई करने पर सहमति व्यक्त की थी। शीर्ष अदालत ने यह भी कहा था कि दो पहलुओं-प्रवर्तन मामले की सूचना रिपोर्ट (ईसीआईआर) प्रदान नहीं करना और बेकसूर होने की धारणा को उलटने पर ‘‘प्रथम दृष्टया’’ पुनर्विचार की आवश्यकता है।
शीर्ष अदालत ने फैसले में कहा था कि ईडी द्वारा दायर ईसीआईआर को प्राथमिकी के बराबर नहीं माना जा सकता है और हर मामले में संबंधित व्यक्ति को इसकी एक प्रति प्रदान करना अनिवार्य नहीं है। बेकसूर होने की धारणा भारतीय आपराधिक कानून का एक पारंपरिक सिद्धांत है, जहां किसी आरोपी को तब तक निर्दोष माना जाता है जब तक कि उसे दोषी साबित न कर दिया जाए। दूसरी ओर, निर्दोष होने की धारणा को उलटने से आरोपी पर अपनी बेगुनाही साबित करने का दायित्व आ जाता है।
भाषा आशीष