सरकार को बांझपन को स्वास्थ्य प्राथमिकता में रखना चाहिए, बीमा के दायरे में लाना चाहिए: अजय मुर्डिया
आशीष नेत्रपाल
- 24 Jul 2024, 05:44 PM
- Updated: 05:44 PM
(पायल बनर्जी)
नयी दिल्ली, 24 जुलाई (भाषा) इंदिरा आईवीएफ के संस्थापक और अध्यक्ष डॉ. अजय मुर्डिया ने आईवीएफ बुनियादी ढांचे में, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में निवेश की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा है कि केंद्र को बांझपन को राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राथमिकता मानना चाहिए और इसे बीमा के दायरे में लाना चाहिए।
मुर्डिया ने 25 जुलाई को मनाए जाने वाले विश्व आईवीएफ दिवस की पूर्व संध्या पर ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा कि वित्तीय विभाजन और मौद्रिक बोझ के कारण भारत में कई लोग आईवीएफ उपचार प्राप्त नहीं कर पाते हैं।
उन्होंने कहा कि आयुष्मान भारत योजना ने वित्तीय सुरक्षा और आवश्यक चिकित्सा कवरेज के माध्यम से लाखों भारतीयों के लिए स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच को बहुत बेहतर बनाया है। मुर्डिया ने कहा कि अगर इस योजना में आईवीएफ उपचार को शामिल किया जाता है, तो इससे जरूरतमंद लोगों के लिए जरूरी सेवाएं ज्यादा सुलभ और किफायती हो जाएंगी तथा लाखों लोगों को फायदा होगा।
कुछ अनुमानों के अनुसार, सक्रिय रूप से गर्भधारण करने की कोशिश कर रहे लगभग 2.75 करोड़ विवाहित जोड़े बांझपन से पीड़ित हैं।
मुर्डिया ने आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि हर साल केवल लगभग 2,75,000 आईवीएफ चक्र ही किए जाते हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘यह खामोश महामारी, जो छह में से एक जोड़े को प्रभावित कर रही है, तेजी से राष्ट्रीय आपातकाल में तब्दील हो रही है, जिसका भारत के सामाजिक ढांचे और आर्थिक संभावनाओं पर दूरगामी असर पड़ेगा।’’
आईवीएफ उपचार की लागत प्रति चक्र दो-तीन लाख रुपये तक है, जो कई परिवारों को कर्ज के जाल में धकेल रहा है। डॉ. मुर्डिया ने कहा कि देश भर में सरकारी आईवीएफ केंद्रों की भारी कमी है, जिससे लाखों लोग माता-पिता बनने के अवसर से वंचित हो रहे हैं।
कई सरकारी वित्तपोषित स्वास्थ्य केंद्रों में अभी भी बांझपन का प्रभावी उपचार प्रदान करने के लिए आवश्यक सुविधाओं का अभाव है। उन्होंने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक आईवीएफ क्लिनिक स्थापित करने और उपचार के लिए वित्तपोषण विकल्प प्रदान करने जैसी निजी क्षेत्र की पहल इस अंतर को पाटने के लिए महत्वपूर्ण हैं।
इंदिरा आईवीएफ के संस्थापक ने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में निदान सुविधाएं और बुनियादी बांझपन जांच सीमित हैं, जिसके कारण कई लोग आधुनिक उपचार के बजाय पारंपरिक या धार्मिक प्रथाओं का सहारा लेते हैं।
उन्होंने कहा कि बांझपन उपचार का परिदृश्य असमानता की एक कठोर तस्वीर पेश करता है। उन्होंने कहा, ‘‘स्वास्थ्य सेवा में स्पष्ट नजर आ रहा यह अंतर एक खतरनाक विभाजन पैदा कर रहा है, जहां अंततः केवल अमीर लोग ही परिवार बनाने का खर्च उठा सकते हैं।’’
मुर्डिया ने कहा, ‘‘देश के 2,500 आईवीएफ केंद्रों में से लगभग आधे बिना किसी व्यवस्थित ढांचे के काम करते हैं, जिससे उपचार की गुणवत्ता की निरंतरता प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा, उपचार का एक बड़ा हिस्सा शहरी क्षेत्रों में केंद्रित है, जिससे ग्रामीण आबादी को इन सेवाओं तक सीमित पहुंच मिलती है और प्रजनन देखभाल की उपलब्धता में महत्वपूर्ण अंतर पैदा होता है।’’
उन्होंने कहा कि बांझपन उपचार, विशेष रूप से आईवीएफ के लिए व्यापक बीमा कवरेज को शामिल करने से दंपतियों पर वित्तीय दबाव कम हो सकता है तथा ये आवश्यक सेवाएं अधिक सुलभ हो सकती हैं।
मुर्डिया ने कहा, ‘‘अब समय आ गया है कि हम भारत के सामाजिक और आर्थिक भविष्य के लिए बांझपन उपचार को मौलिक अधिकार के रूप में प्राथमिकता दें।’’
भाषा आशीष