हल्द्वानी अतिक्रमण : न्यायालय ने मुख्य सचिव को पुनर्वास के लिए बैठक करने का निर्देश दिया
धीरज प्रशांत
- 24 Jul 2024, 08:38 PM
- Updated: 08:38 PM
नयी दिल्ली, 24 जुलाई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को उत्तराखंड के मुख्य सचिव को निर्देश दिया कि वह हल्द्वानी में रेलवे की जमीन पर अतिक्रमण करने वाले 50,000 से अधिक लोगों के पुनर्वास के लिए केंद्र और रेलवे के साथ बैठक करें।
उच्चतम न्यायालय केंद्र द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रहा है, जिसमें उसके पिछले साल पांच जनवरी के आदेश को रद्द करने का अनुरोध किया गया है। न्यायालय ने हल्द्वानी में उस 29 एकड़ भूमि से अतिक्रमण हटाने के उत्तराखंड उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक लगा दी थी, जिस पर रेलवे ने दावा जताया है।
याचिका में कहा गया कि रेलवे परिचालन को सुगम बनाने के लिए उक्त भूमि तत्काल उपलब्ध कराई जानी चाहिए क्योंकि पटरियों की सुरक्षा के लिए बनाई गई दीवार पिछले साल मानसून के दौरान ढह गई।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि राज्य सरकार को यह योजना बतानी होगी कि इन लोगों का कैसे और कहां पुनर्वास किया जाएगा।
अदालत ने कहा कि, ‘‘यह मानते हुए कि वे अतिक्रमणकारी हैं, लेकिन वे भी इंसान हैं और दशकों से वहां रह रहे हैं। उन्होंने पक्के मकान भी बना लिए हैं, तो इस स्थिति से कैसे निपटा जाए।’’
पीठ ने कहा, ‘‘अदालतें निर्दयी नहीं हो सकतीं और साथ ही लोगों को अतिक्रमण करने के लिए प्रोत्साहित भी नहीं कर सकतीं। यह बहुत ही विचित्र स्थिति है।’’ इस पीठ में न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां भी शामिल हैं।
उच्चतम न्यायालय ने बिना किसी देरी के राज्य सरकार को बुनियादी ढांचा विकसित करने और रेलवे लाइन के लिए आवश्यक जमीन की पहचान करने का निर्देश दिया। उसने अतिक्रमण हटाने के कारण प्रभावित होने वाले परिवारों की पहचान करने का भी निर्देश दिया।
उच्चतम न्यायालय ने सुनवाई के शुरुआत में इस तथ्य पर आपत्ति जताई कि रेलवे ने एक निजी व्यक्ति द्वारा दायर जनहित याचिका के आधार पर उत्तराखंड उच्च न्यायालय से बेदखली का आदेश प्राप्त किया।
पीठ ने सवाल किया, ‘‘ क्या आपने अतिक्रमण करने वालों को कोई नोटिस जारी किया? आप जनहित याचिका की आड़ क्यों ले रहे हैं? अगर वहां पर अतिक्रमणकारी हैं तो रेलवे को अतिक्रमणकारियों को नोटिस जारी करना चाहिए।’’
रेलवे की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत को सूचित किया कि सार्वजनिक परिसर (अनधिकृत कब्जाधारियों की बेदखली) अधिनियम 1971 के तहत भी अतिक्रमकारियों के खिलाफ कार्यवाही लंबित है।
भाटी ने अदालत से ‘क्रमिक आधार पर’ रोक हटाने या इसमें संशोधन करने का अुनरोध करते हुए कहा कि अतिक्रमणकारियों के अवैध कब्जे के कारण रेलवे की कई विस्तार योजनाएं रुकी हुई हैं।
उन्होंने अदालत को बताया कि मौजूदा समय में 1200 झोपड़ियों को हटाने की जरूरत है और स्पष्ट किया कि रेलवे के पास अतिक्रमकारियों के पुनर्वास के लिए कोई योजना नहीं है।
शीर्ष अदालत ने कहा कि भूमि पर अधिकार का दावा करने वालों को उचित अवसर दिया जाना चाहिए। साथ ही, उसने उत्तराखंड सरकार को ऐसी जगह का सुझाव देने का निर्देश दिया, जहां ऐसे प्रभावित/ हटाए गए परिवारों का पुनर्वास किया जा सके।
रेलवे के मुताबिक उक्त जमीन पर 4,365 अतिक्रमणकारी हैं जबकि जमीन पर काबिज लोगों का दावा है कि वे जमीन के मालिक हैं। विवादित जमीन पर 4,000 से अधिक परिवारों के लगभग 50,000 लोग रहते हैं, जिनमें से अधिकांश मुस्लिम समुदाय के हैं।
शीर्ष अदालत ने पिछले साल पांच जनवरी को हल्द्वानी में रेलवे के दावे वाली 29 एकड़ जमीन पर से अतिक्रमण हटाने के उत्तराखंड उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक लगा दी थी। न्यायालय ने कहा था कि यह एक ‘मानवीय मुद्दा’ है और 50,000 लोगों को रातोंरात नहीं हटाया जा सकता।
भाषा धीरज