उच्चतम न्यायालय ने आशीष मिश्रा को जमानत दी, निचली अदालत से सुनवाई में तेजी लाने को कहा
सिम्मी दिलीप
- 22 Jul 2024, 06:33 PM
- Updated: 06:33 PM
नयी दिल्ली, 22 जुलाई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने 2021 के लखीमपुर-खीरी हिंसा मामले में पूर्व केंद्रीय मंत्री अजय मिश्रा के बेटे आशीष मिश्रा को सोमवार को जमानत दे दी और उसे दिल्ली या लखनऊ में ही रहने का निर्देश दिया।
हिंसा की इस घटना में आठ लोगों की मौत हो गई थी।
शीर्ष अदालत ने पिछले साल 25 जनवरी को हिंसा की ‘‘इस दुर्भाग्यपूर्ण एवं भयावह घटना’’ से जुड़े मामले में आशीष मिश्रा को अंतरिम जमानत दी थी।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने मामले में आरोपी किसानों गुरुविंदर सिंह, कमलजीत सिंह, गुरुप्रीत सिंह और विचित्र सिंह को भी जमानत दे दी और निचली अदालत को सुनवाई में तेजी लाने का निर्देश दिया।
उत्तर प्रदेश में लखीमपुर खीरी जिले के तिकुनिया में तीन अक्टूबर 2021 को हुई हिंसा में चार किसानों समेत आठ लोगों की मौत हो गई थी। यह हिंसा तब भड़की थी, जब किसान उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के इलाके के दौरे का विरोध कर रहे थे।
इस दौरान एक एसयूवी (स्पोर्ट्स यूटिलिटी व्हिकल) ने चार किसानों को कुचल दिया था। इसके बाद गुस्साए किसानों ने वाहन चालक और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के दो कार्यकर्ताओं की कथित तौर पर पीट-पीटकर हत्या कर दी थी। इस हिंसा में एक पत्रकार की भी मौत हो गई थी।
पीठ ने कहा, ‘‘सभी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए अंतरिम आदेश को पूर्ण आदेश किया जाता है... हमें सूचित किया गया है कि 114 गवाहों में से अब तक सात से पूछताछ की गई है। हमें लगता है कि मुकदमे की सुनवाई में तेजी लाने की जरूरत है।’’
उसने कहा, ‘‘हम निचली अदालत को निर्देश देते हैं कि वह अन्य लंबित समयबद्ध या अत्यावश्यक मामलों को ध्यान में रखते हुए समय सीमा तय करे, लेकिन लंबित विषय को प्राथमिकता दे।’’
शीर्ष अदालत ने सरकारी वकील को निर्देश दिया कि वह सुनिश्चित करें कि एक दिन में कम से कम पांच गवाहों से पूछताछ की जाए और उसने निचली अदालत से स्थिति रिपोर्ट मांगी।
सुनवाई शुरू होते ही मिश्रा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे ने दलील दी कि आरोपी के पिता अब सांसद या मंत्री नहीं हैं।
दवे ने कहा, ‘‘वह चुनाव हार गए हैं, इसलिए मैं (आरोपी) कितना प्रभावशाली हूं, इस बारे में जो पूरा विवाद खड़ा किया गया था, वह खत्म हो गया है।’’
इस पर पीठ ने कहा, ‘‘वह मंत्री न होते हुए भी प्रभावशाली हो सकते हैं। मुकदमे की स्थिति क्या है?’’
पीड़ितों में से एक की ओर से पेश हुए वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि मुकदमे की शुरुआत के 19 महीने बाद तक केवल सात गवाहों से ही पूछताछ की गई है। उन्होंने दलील दी कि इस तरह तो मुकदमा कभी खत्म नहीं होगा।
दवे ने कहा कि देरी इसलिए हो रही है, क्योंकि गवाह अदालत में पेश नहीं हो रहे।
उन्होंने कहा कि उनके मुवक्किल के पास दिल्ली में घर नहीं है, क्योंकि उनके पिता चुनाव हार गए हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘उत्तर प्रदेश में प्रवेश करने संबंधी शर्त अब भी लागू है। हर बार मुझे कोई न कोई जगह किराए पर लेनी पड़ती है। मैं उत्तर प्रदेश में प्रवेश भी नहीं कर सकता। मेरी दो बेटियां हैं। कृपया मुझे उत्तर प्रदेश में लखीमपुर से बाहर रहने की अनुमति दे दी जाए।’’
इसके बाद, शीर्ष अदालत ने आदेश पारित किया कि उनकी आवाजाही दिल्ली या लखनऊ तक ही सीमित रखी जाए।
भाषा सिम्मी