पिछले दो साल में जलवायु परिवर्तन के कारण खाद्य कीमतें बढ़ीं : आर्थिक समीक्षा
राजेश राजेश अजय
- 22 Jul 2024, 06:25 PM
- Updated: 06:25 PM
नयी दिल्ली, 22 जुलाई (भाषा) आर्थिक समीक्षा 2023-24 में सोमवार को कहा गया कि पिछले दो साल में खराब मौसम, जलाशयों के निचले स्तर और फसल क्षति ने कृषि उत्पादन को प्रभावित किया है, जिससे खाद्य कीमतों में वृद्धि हुई है।
इसमें कहा गया है कि प्रतिकूल मौसम की स्थिति ने विशेष रूप से सब्जियों और दालों के उत्पादन की संभावनाओं को प्रभावित किया है।
पिछले वर्ष की अर्थव्यवस्था की स्थिति पर एकीकृत रिपोर्ट में कहा गया है, ‘‘वित्त वर्ष 2022-23 और 2023-24 में कृषि क्षेत्र खराब मौसम की घटनाओं, जलाशयों के निचले स्तर और क्षतिग्रस्त फसलों से प्रभावित हुआ है जिसने कृषि उत्पादन और खाद्य कीमतों पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है। इसलिए, उपभोक्ता खाद्य मूल्य सूचकांक (सीएफपीआई) पर आधारित खाद्य मुद्रास्फीति 2021-22 के 3.8 प्रतिशत से बढ़कर 2022-23 में 6.6 प्रतिशत और 2023-24 में 7.5 प्रतिशत हो गई।’’
सरकार ने कहा कि पिछले दो वर्षों में खाद्य मुद्रास्फीति एक वैश्विक घटना रही है। शोध से पता चलता है कि जलवायु परिवर्तन के कारण खाद्य कीमतों में वृद्धि हो रही है - जिनमें गर्मी की लू, असमान मानसून वितरण, बेमौसम बारिश, ओलावृष्टि, मूसलाधार बारिश और ऐतिहासिक शुष्क परिस्थितियां शामिल हैं।
आर्थिक समीक्षा के अनुसार, मौसमी परिवर्तन, क्षेत्र-विशिष्ट फसल रोग जैसे कि ‘ह्वाइट फ्लाई’ मक्खी संक्रमण, देश के उत्तरी भाग में मानसून की बारिश का समय से पहले आना और भारी वर्षा के कारण अलग-अलग क्षेत्रों में ‘लॉजिस्टिक’ व्यवधान के कारण जुलाई, 2023 में टमाटर की कीमतों में उछाल आया।
प्याज की कीमतों में उछाल के लिए कई कारकों को जिम्मेदार ठहराया गया, जिसमें पिछली कटाई के मौसम के दौरान बारिश से रबी प्याज की गुणवत्ता प्रभावित होना, खरीफ मौसम के दौरान बुवाई में देरी, खरीफ उत्पादन को प्रभावित करने वाले लंबे समय तक सूखे की स्थिति और अन्य देशों द्वारा किए गए व्यापार संबंधी उपाय शामिल हैं।
सरकार ने कहा, ‘‘पिछले दो साल में प्रतिकूल मौसम की स्थिति की वजह से कम उत्पादन के कारण दालों, विशेष रूप से अरहर की कीमतों में वृद्धि हुई है। रबी मौसम में धीमी बुवाई प्रगति और दक्षिणी राज्यों में जलवायु संबंधी गड़बड़ी के कारण उड़द का उत्पादन प्रभावित हुआ।’’
चने का रकबा और उत्पादन भी पिछले रबी सत्र की तुलना में कम रहा।
सरकार ने यह भी कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था ने कोविड के बाद के सुधार गति को मजबूत किया है और यह मजबूत स्थिति में है तथा भू-राजनीतिक चुनौतियों का सामना करने के प्रति मजबूती प्रदर्शित कर रही है।
इसमें कहा गया है कि सुधार गति को बनाए रखने के लिए घरेलू मोर्चे पर कड़ी मेहनत करनी होगी क्योंकि व्यापार, निवेश और जलवायु जैसे प्रमुख वैश्विक मुद्दों पर समझौते तक पहुंचना असाधारण रूप से कठिन हो गया है।
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