एआईएमपीएलबी, अन्य मुस्लिम संगठनों ने मदरसों की स्थिति ‘कमजोर’ करने के प्रयास का आरोप लगाया
अमित माधव
- 20 Jul 2024, 10:12 PM
- Updated: 10:12 PM
नयी दिल्ली, 20 जुलाई (भाषा) ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड समेत कई मुस्लिम संगठनों ने शनिवार को आरोप लगाया कि उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में मदरसों की स्थिति को कमजोर करने के प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने मांग की कि प्रशासन इस तरह की "अवैध और दमनकारी" कार्रवाइयां बंद करे।
बोर्ड और जमीयत उलेमा-ए-हिंद, जमात-ए-इस्लामी हिंद और जमीयत अहल-ए-हदीस जैसे मुस्लिम संगठनों द्वारा जारी एक संयुक्त बयान में कहा गया है कि वे राज्य सरकारों की "अल्पसंख्यक विरोधी" नीतियों को बदलने के लिए हर संभव कानूनी और लोकतांत्रिक कदम उठाने के लिए दृढ़ हैं।
बयान में कहा गया है, "हम देश के नागरिक उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और अन्य राज्यों में मदरसों की स्थिति और पहचान को विभिन्न बहानों के माध्यम से कमजोर करने के प्रयासों की कड़ी निंदा करते हैं। हम स्पष्ट रूप से कहते हैं कि अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों यानी मदरसों के संबंध में राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग द्वारा राज्य सरकारों को जारी किए गए निर्देश अवैध हैं और आयोग के अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं।"
उन्होंने कहा कि इन निर्देशों के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव ने जिला अधिकारियों को मदरसों का सर्वेक्षण करने और "गैर-मान्यता प्राप्त" मदरसों से छात्रों को सरकारी स्कूलों में स्थानांतरित करने का निर्देश दिया है।
बयान में कहा गया है कि 8,449 "गैर-मान्यता प्राप्त स्कूलों" की सूची प्रकाशित की गई है, जिसमें दारुल उलूम देवबंद, दारुल उलूम नदवतुल उलेमा, लखनऊ, मजाहिर उलूम सहारनपुर, जामिया सलफिया वाराणसी, जामिया अशरफिया मुबारकपुर, मदरसातुल इस्लाह सरायममीर और जामिया अल-फलाह बलेरियागंज जैसे प्रसिद्ध और ऐतिहासिक संस्थान शामिल हैं।
बयान में कहा गया है, ‘‘जिला मजिस्ट्रेट इन संस्थानों से छात्रों को सरकारी स्कूलों में स्थानांतरित करने के लिए दबाव डाल रहे हैं। मुख्य सचिव का यह परिपत्र और जिला अधिकारियों का दबाव स्पष्ट रूप से अवैध है।"
संयुक्त बयान में कहा गया है कि इसके अतिरिक्त, जिला प्रशासन ने इन स्कूलों से गैर-मुस्लिम छात्रों को हटाकर उन्हें सरकारी स्कूलों में स्थानांतरित कर दिया है, जो "उनके व्यक्तिगत चयन के अधिकार और हमारी संयुक्त भारतीय संस्कृति और सभ्यता पर हमला है।’’
एआईएमपीएलबी के अध्यक्ष मौलाना खालिद सैफुल्लाह रहमानी, बोर्ड के उपाध्यक्ष मौलाना असद मदनी और जमीयत उलेमा-ए-हिंद के प्रमुख अरशद मदनी सहित अन्य लोगों द्वारा हस्ताक्षरित बयान में कहा गया है कि अब मुस्लिम छात्रों पर भी शिक्षा के अधिकार अधिनियम के तहत बुनियादी शिक्षा प्राप्त करने का दबाव बनाया जा रहा है।
बयान में कहा गया है कि इन मदरसों के प्रशासकों को ऐसा न करने की स्थिति में कार्रवाई की धमकी दी जा रही है।
बयान में दावा किया गया है कि मध्य प्रदेश में सरकार ने एक कदम और आगे बढ़कर मदरसा में छात्रों को प्रतिदिन सरस्वती वंदना करने के लिए बाध्य किया है। बयान में कहा गया है, "हम, मुस्लिम धार्मिक और राष्ट्रीय संगठनों के जिम्मेदार सदस्य, तथा धार्मिक विद्यालयों और विश्वविद्यालयों के प्रमुख, यह स्पष्ट करना आवश्यक समझते हैं कि संविधान के अनुच्छेद 30(1) के तहत अल्पसंख्यकों को अपने शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने और उनका प्रशासन करने का मौलिक अधिकार है।’’
बयान में कहा गया है, ‘‘इसके अतिरिक्त, शिक्षा का अधिकार अधिनियम स्पष्ट रूप से धार्मिक विद्यालयों को छूट देता है।"
बयान में कहा गया है कि ये संस्थान लाखों बच्चों को भोजन और आवास के साथ-साथ मुफ्त, उच्च-गुणवत्ता वाली शिक्षा प्रदान करते हैं और शैक्षिक रूप से पिछड़े मुस्लिम समुदाय के बीच शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए वर्षों से मौन लेकिन सफल प्रयास कर रहे हैं।
बयान में कहा गया है कि इन संस्थानों और उनके स्नातकों ने देश की स्वतंत्रता में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है और स्वतंत्रता के बाद भी इसके विकास में योगदान देना जारी रखा है।
इसमें कहा गया है कि अचानक और एकतरफा कार्रवाई "इस दीर्घकालिक और स्थिर प्रणाली को बाधित करने का एक अनुचित प्रयास" है, जिससे लाखों बच्चों को शैक्षिक नुकसान हो रहा है और उन पर अनुचित मानसिक और मनोवैज्ञानिक दबाव पड़ रहा है।
बयान में कहा गया है कि "हम मांग करते हैं कि इन राज्यों का प्रशासन इन अवैध, अनैतिक और दमनकारी कार्रवाइयों को बंद करे और बच्चों के भविष्य को खतरे में न डाले।"
भाषा अमित