अदालत ने वकील निकायों के चुनावों में महिलाओं के लिए आरक्षण की याचिका पर विधिज्ञ परिषद से जवाब मांगा
प्रशांत माधव
- 18 Jul 2024, 08:20 PM
- Updated: 08:20 PM
नयी दिल्ली, 18 जुलाई (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने बृहस्पतिवार को दिल्ली बार एसोसिएशनों में महिला वकीलों के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने की मांग वाली याचिका पर दिल्ली विधिज्ञ परिषद और विभिन्न विधिज्ञ निकायों से जवाब मांगा।
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश मनमोहन और न्यायमूर्ति तुषार राव गेडेला की पीठ ने एक महिला वकील द्वारा दायर याचिका पर बार दिल्ली विधिज्ञ परिषद (बीसीडी), भारतीय विधिज्ञ परिषद (बीसीआई) और दिल्ली उच्च न्यायालय बार एसोसिएशन को नोटिस जारी किए।
अदालत ने नयी दिल्ली बार एसोसिएशन, दिल्ली बार एसोसिएशन, साकेत बार एसोसिएशन, द्वारका कोर्ट बार एसोसिएशन, शाहदरा बार एसोसिएशन और रोहिणी बार एसोसिएशन को उनके संबंधित सचिवों के माध्यम से नोटिस जारी किए और उनसे याचिका पर जवाब दाखिल करने को कहा।
उच्च न्यायालय ने मामले की अगली सुनवाई 12 अगस्त को तय की है।
याचिकाकर्ता शोभा गुप्ता ने कहा कि हाल के वर्षों में, महिलाएं कानूनी पेशे में काफी प्रगति कर रही हैं, हालांकि, कानूनी पेशे में महिलाओं के प्रवेश की उच्च संख्या के बावजूद, यह महिला वकीलों द्वारा नेतृत्व के पदों और उच्च-पदस्थ भूमिकाओं को ग्रहण करने या बीसीडी या किसी भी बार एसोसिएशन की अध्यक्ष बनने की संख्या में परिलक्षित नहीं होता है।
उसने कहा, “वकालत और विधिज्ञ परिषद तथा बार एसोसिएशनों में प्रमुख पदों पर मुख्य रूप से पुरुष वकीलों का दबदबा है। दिल्ली में पंजीकृत वकीलों की कुल संख्या में से लगभग एक तिहाई महिलाएं हैं। बीसीडी और अन्य बार एसोसिएशनों में प्रभावी पदों पर महिलाओं का यह कम प्रतिनिधित्व महिलाओं के अधिकारों और न्याय तक पहुंच को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकता है, साथ ही न्याय प्रणाली की समग्र प्रभावशीलता को भी कम कर सकता है।”
याचिकाकर्ता का प्रतिनिधित्व वरिष्ठ अधिवक्ता पिंकी आनंद कर रही हैं। पिंकी आनंद ने कहा कि मई में उच्चतम न्यायालय ने उच्चतम न्यायालय बार एसोसिएशन के चुनाव में महिला वकीलों के लिए एक तिहाई सीटें आरक्षित करने का आदेश पारित किया था ताकि महिला वकीलों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो सके।
याचिका में कहा गया है कि बीसीडी और अन्य बार एसोसिएशनों में प्रभावी पदों पर महिलाओं का कम प्रतिनिधित्व महिलाओं के अधिकारों और न्याय तक पहुंच पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है, साथ ही न्याय प्रणाली की समग्र प्रभावशीलता को भी प्रभावित कर सकता है।
भाषा प्रशांत