निजी क्षेत्र में कन्नड भाषियों को आरक्षण : कर्नाटक सरकार बचाव की मुद्रा में आई
धीरज माधव
- 17 Jul 2024, 08:39 PM
- Updated: 08:39 PM
बेंगलुरु, 17 जुलाई (भाषा) कर्नाटक में कार्य रही निजी क्षेत्र की कंपनियों की नौकरियों में कन्नड भाषियों को ‘शत प्रतिशत आरक्षण’ देने के फैसले का कारोबारी दिग्गजों और प्रौद्योगिकी क्षेत्र के नामी लोगों द्वारा कड़ी आलोचना किए जाने के बाद राज्य सरकार बचाव की मुद्रा में आ गई है।
राज्य मंत्रिमंडल की सोमवार को हुई बैठक में जिन मंत्रियों ने कर्नाटक राज्य उद्योग, कारखाना और अन्य प्रतिष्ठानों में स्थानीय उम्मीदवारों को रोजगार देने संबंधी विधेयक, 2024 को मंजूरी दी थी, अब उन्होंने ने ही उद्योगों को आश्वासन दिया कि उन्हें किसी प्रकार का डर या आशंका नहीं होनी चाहिए क्योंकि वे इस पर और अधिक चर्चा करेंगे।
राज्य मंत्रिमंडल ने सोमवार को कर्नाटक राज्य उद्योग, कारखाने और अन्य प्रतिष्ठानों में स्थानीय उम्मीदवारों को रोजगार देने संबंधी विधेयक, 2024 को मंजूरी दी थी। इसमें निजी कंपनियों के लिए अपने प्रतिष्ठानों में कन्नड़ भाषी लोगों को आरक्षण देना अनिवार्य करने का प्रावधान है।
प्रस्तावित विधेयक के मुताबिक, ‘‘ किसी भी उद्योग, कारखाना या अन्य प्रतिष्ठानों में प्रबंधन स्तर पर 50 प्रतिशत और गैर प्रबंधन श्रेणी में 70 प्रतिशत आरक्षण स्थानीय लोगों को देना अनिवार्य होगा।’’
इसमें कहा गया है कि यदि उम्मीदवार के पास कन्नड़ भाषा के साथ माध्यमिक विद्यालय का प्रमाणपत्र नहीं है, तो उन्हें ‘नोडल एजेंसी’ द्वारा आयोजित कन्नड़ प्रवीणता परीक्षा उत्तीर्ण करनी होगी।
प्रस्तावित विधेयक के मुताबिक नोडल एजेंसी को रिपोर्ट के सत्यापन के उद्देश्य से किसी नियोक्ता, अधिभोगी या प्रतिष्ठान के प्रबंधक के पास मौजूद किसी भी रिकॉर्ड, सूचना या दस्तावेज को मांगने का अधिकार होगा।
इसमें कहा गया है कि सरकार अधिनियम के प्रावधानों का अनुपालन कराने के लिए सहायक श्रम आयुक्त से उससे ऊपर के स्तर के अधिकारी को प्राधिकृत अधिकारी के रूप में नियुक्त कर सकती है।
कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धरमैया ने बुधवार को निजी क्षेत्र की नौकरियों में ‘‘ कन्नड़ भाषियों को शत-प्रतिशत आरक्षण’’ देने को लेकर सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर जारी अपनी पोस्ट को हटा लिया।
उन्होंने सोशल मीडिया मंच पर एक अन्य पोस्ट कर बताया कि मंत्रिमंडल ने राज्य के निजी उद्योगों और अन्य संस्थानों के प्रशासनिक पदों में 50 प्रतिशत और गैर प्रशासनिक पदों में 75 प्रतिशत आरक्षण कन्नड़ भाषियों को देने के प्रस्ताव को मंजूरी दी है।
मुख्यमंत्री ने मंगलवार को ‘एक्स’ पर जारी पोस्ट में कहा था, ‘‘ मंत्रिमंडल की कल हुई बैठक में राज्य के सभी निजी उद्योगों में ‘सी’ और ‘डी’ श्रेणी की नौकरियों को शत प्रतिशत कन्नड भाषियों के लिए आरक्षित करने वाले विधेयक को मंजूरी दी गई है।’’
कर्नाटक के अवसंरचना विकास, मध्यम एवं भारी उद्योग मंत्री एम.बी.पाटिल ने बुधवार को कहा कि सरकार कन्नड़ भाषियों के साथ-साथ उद्योगों के हितों की रक्षा करने के लिए विस्तृत चर्चा करेगी।
पाटिल ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर जारी पोस्ट में कहा, ‘‘कन्नड़ भाषियों के हितों को सर्वोपरि रखते हुए, मैं इस मुद्दे पर मुख्यमंत्री सिद्धरमैया, आईटी-बीटी मंत्री, कानून मंत्री और श्रम मंत्री के साथ चर्चा करूंगा। हम व्यापक विचार-विमर्श करेंगे। हम यह सुनिश्चित करेंगे कि उद्योगों के साथ-साथ कन्नड़ भाषियों के हितों की भी रक्षा की जाए।’’
उन्होंने कहा, ‘‘कर्नाटक एक प्रगतिशील राज्य है और हम सदी में एक बार होने वाली इस औद्योगिकीकरण की दौड़ में हारने का जोखिम नहीं उठा सकते। हम यह सुनिश्चित करेंगे कि सभी के हितों की रक्षा हो। उद्योगों को आश्वस्त किया जाता है कि उन्हें किसी भी तरह का डर या आशंका रखने की जरूरत नहीं है और वे निश्चिंत रह सकते हैं।’’
विधेयक पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए राज्य के सूचना प्रौद्योगिकी एवं जैव प्रौद्योगिकी मंत्री प्रियंक खरगे ने कहा, ‘‘श्रम मंत्री (संतोष लाड) ने इस (विधेयक) का सुझाव दिया था और हम उद्योग एवं आईटी विभाग के साथ इस पर व्यापक विचार-विमर्श करेंगे।’’उन्होंने कहा, ‘‘हम उद्योग जगत के साथ भी विचार-विमर्श करेंगे। मैं उद्योग जगत को यह आश्वासन देना चाहता हूं।’’
हालांकि, उप मुख्यमंत्री डी.के.शिवकुमार ने विधेयक के पक्ष में राय रखी।
प्रस्तावित विधेयक का स्वागत करते हुए शिवकुमार ने कहा, ‘‘ कांग्रेस कर्नाटक की सत्ता में कन्नड़ भाषियों के सम्मान को कायम करने के लिए आई है, फिर चाहे वह निजी प्रतिष्ठानों के सूचना बोर्ड हो, कन्नड़ झंडा, कन्नड़ भाषा, संस्कृति, दस्तावेज या कन्नड़ भाषियों के लिए आरक्षण का प्रतिशत तय करना हो।’’
उप मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि सरकार तकनीकी क्षेत्रों में हस्तक्षेप नहीं करेगी। उन्होंने कहा, ‘‘हम जरूरत पड़ी तो हम तकनीशियनों को इससे छूट देंगे।’’
उद्योग जगत ने विधेयक की आलोचना करते हुए कहा कि यह एक प्रतिगामी कदम है तथा अदूरदर्शिता दर्शाता है।
चर्चित उद्यमी एवं इंफोसिस के पूर्व मुख्य वित्त अधिकारी टी.वी.मोहनदास पाई ने विधेयक को ‘फासीवादी’ करार दिया है। उन्होंने सोशल मीडिया पर जारी पोस्ट में कहा, ‘‘ इस विधेयक को रद्द कर देना चाहिए। यह पक्षपातपूर्ण, प्रतिगामी और संविधान के विरुद्ध है। अविश्वसनीय है कि कांग्रेस इस तरह का विधेयक लेकर आ आई है- एक सरकारी अधिकारी निजी क्षेत्र की भर्ती समितियों में बैठेगा? लोगों को भाषा की परीक्षा देनी होगी...?’’
फार्मा कंपनी ‘बायोकॉन’ की प्रबंध निदेशक किरण मजूमदार शॉ ने कहा, ‘‘ एक प्रौद्योगिकी केंद्र के रूप में हमें कुशल प्रतिभा की आवश्यकता है और हमारा उद्देश्य स्थानीय लोगों को रोजगार प्रदान करना है। हमें इस कदम से प्रौद्योगिकी में अपनी अग्रणी स्थिति को प्रभावित नहीं करना चाहिए...।’’
एसोचैम की कर्नाटक इकाई के सह अध्यक्ष आर.के. मिश्रा ने ‘एक्स’ पर जारी पोस्ट में तंज कसते हुए कहा, ‘‘ कर्नाटक सरकार का एक और प्रतिभावान कदम। स्थानीय स्तर पर आरक्षण और हर कंपनी की निगरानी के लिए सरकारी अधिकारियों की नियुक्ति को अनिवार्य बनाना। इससे भारतीय आईटी और जीसीसी भयभीत होंगे। अदूरदर्शी।’’
सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) कंपनियों के शीर्ष निकाय नैसकॉम ने कर्नाटक में निजी क्षेत्र में स्थानीय लोगों के लिए आरक्षण को अनिवार्य करने वाले विधेयक पर निराशा और चिंता जतायी है।
आईटी कंपनियों के निकाय ने बयान में कहा, ‘‘नैसकॉम के सदस्य इस विधेयक के प्रावधानों को लेकर काफी चिंतित हैं और राज्य सरकार से विधेयक को वापस लेने का आग्रह करते हैं। विधेयक के प्रावधान इस प्रगति को उलटने, कंपनियों को दूर करने और स्टार्टअप को दबाने की चेतावनी हैं। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब अधिक-से-अधिक वैश्विक कंपनियां राज्य में निवेश पर विचार कर रही हैं।’
कर्नाटक का यह कदम हरियाणा सरकार द्वारा पेश किए गए विधेयक जैसा ही है, जिसमें राज्य के निवासियों के लिए निजी क्षेत्र की नौकरियों में 75 प्रतिशत आरक्षण अनिवार्य किया गया था। हालांकि, पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने 17 नवंबर 2023 को हरियाणा सरकार के फैसले को रद्द कर दिया था।
भाषा धीरज