‘रिजॉल्व तिब्बत एक्ट’ लाने के पीछे चीन के साथ अमेरिका की प्रतिद्वंद्विता मुख्य वजह: मेनन
आशीष नरेश
- 17 Jul 2024, 05:58 PM
- Updated: 05:58 PM
नयी दिल्ली, 17 जुलाई (भाषा) पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) शिवशंकर मेनन ने दावा किया है कि अमेरिका द्वारा हाल में ‘रिजॉल्व तिब्बत एक्ट’ लाने के पीछे मुख्य वजह तिब्बत के प्रति उसकी चिंता नहीं बल्कि चीन के साथ प्रतिद्वंद्विता है।
पूर्व राजनयिक दिलीप सिन्हा की किताब ‘‘इम्पीरियल गेम्स इन तिब्बत: द स्ट्रगल फॉर स्टेटहुड एंड सॉवरीनिटि’’ के विमोचन के अवसर पर मंगलवार को मेनन ने तर्क दिया कि तिब्बत के प्रति अमेरिका की प्रतिबद्धता की ‘‘स्पष्ट सीमाएं’’ हैं और वे आज अपने हित में तिब्बत का झंडा लहरा रहे हैं।
मेनन ने कहा, ‘‘मैं यह कहने में बहुत सावधानी बरतना चाहूंगा कि ‘दुनिया बदल गई है क्योंकि उन्होंने (अमेरिका ने) एक कानून पारित कर दिया है।’ मुझे लगता है कि आपको शक्तियों के बुनियादी सह-संबंध और शक्तियों के संतुलन, लोगों की वास्तविक ताकत और महाशक्तियों के हित क्या हैं और वे इस समय इसे कैसे देखते हैं, इस पर गौर करने की जरूरत है।’’
वर्ष 2006-09 तक विदेश सचिव रह चुके मेनन ने कहा, ‘‘आज, अमेरिकी तिब्बत का झंडा लहराने को अपना हित मानते हैं, लेकिन वे तिब्बत को मान्यता देने के दायरे तक नहीं जाना चाहते...यह तिब्बत के लिए चिंता से प्रेरित नहीं है, बल्कि इसका मुख्य कारण चीन के साथ प्रतिद्वंद्विता है।’’
अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन के हाल में संबंधित विधेयक पर हस्ताक्षर करने से यह कानून बना गया है, जो तिब्बत के लिए अमेरिकी समर्थन को बढ़ाता है और सुदूर हिमालयी क्षेत्र की स्थिति और शासन पर विवाद के शांतिपूर्ण समाधान के लिए चीन और दलाई लामा के बीच बातचीत को बढ़ावा देता है।
दूसरी ओर, चीन ने ‘रिजॉल्व तिब्बत एक्ट’ का विरोध करते हुए इसे ‘‘अस्थिरता पैदा करने वाला’’ कानून बताया था। यह कानून तिब्बत के लिए अमेरिकी समर्थन को बढ़ाता है। यह कानून अमेरिकी अधिकारियों को चीन सरकार की ओर से तिब्बत के बारे में गलत सूचनाओं का सक्रिय और सीधे तौर पर मुकाबला करने का अधिकार देता है।
मेनन (75) ने तिब्बती संस्कृति, सभ्यता और पहचान को ‘‘मजबूत बनाए रखने’’ के लिए भारत के प्रयासों की सराहना की। उन्होंने यह भी कहा कि तिब्बत अपनी समस्याओं को हल करने के लिए महाशक्तियों की प्रतिद्वंद्विता पर निर्भर नहीं रह सकता। उन्होंने कहा कि आर्मेनियाई लोगों की तरह तिब्बती भी ‘‘गुमशुदा लोग’’ हो सकते हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘वे गुमशुदा नहीं हैं। इसका एक कारण दलाई लामा, उनका व्यक्तित्व और उन्होंने जो किया है, वो है। लेकिन मैं यह भी सोचता हूं कि भारत ने क्या दिया है और हमें इसे नहीं भूलना चाहिए तथा कभी हार नहीं माननी चाहिए।"।’’
वर्ष 1959 में चीन विरोधी विद्रोह के विफल होने के बाद 14वें दलाई लामा तिब्बत छोड़कर भारत आ गए, जहां उन्होंने हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में निर्वासित सरकार की स्थापना की। 2002 से 2010 तक दलाई लामा के प्रतिनिधियों और चीनी सरकार के बीच नौ दौर की बातचीत हुई, लेकिन कोई ठोस नतीजा नहीं निकला।
किताब की प्रशंसा करते हुए मेनन ने कहा कि इसमें घटनाक्रम का ‘‘ईमानदार विवरण’’ है- चाहे वह महाशक्तियों के बीच प्रतिद्वंद्विता हो, या ये हो कि तिब्बत पर इसका क्या प्रभाव पड़ा या भारत पर इसका क्या प्रभाव पड़ा।
भाषा आशीष