जम्मू-कश्मीर के दलों ने लोकसभा के साथ विधानसभा चुनाव नहीं कराने पर निराशा जताई
धीरज संतोष
- 16 Mar 2024, 08:28 PM
- Updated: 08:28 PM
श्रीनगर, 16 मार्च (भाषा) जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक दलों ने लोकसभा चुनाव के साथ केंद्र शासित प्रदेश की विधानसभा के लिए चुनाव नहीं कराए जाने पर निराशा जताई है। उनका कहना है कि (विधानसभा) चुनाव को लंबी अवधि तक स्थगित कर केंद्र शासित प्रदेश के लोगों को अहम लोकतांत्रिक स्थान देने से ‘इनकार’ किया जा रहा है।
नेशनल कॉन्फ्रेंस (नेकां) के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा कि निर्वाचन आयोग (ईसी) जम्मू-कश्मीर में एक साथ चुनाव कराने में असमर्थ है, जबकि उसने स्वीकार किया है कि केंद्र शासित प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं।
अब्दुल्ला ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर पोस्ट किया, ‘‘ एक राष्ट्र एक चुनाव पर इतनी बात हो रही है। निर्वाचन आयोग जम्मू-कश्मीर में आम चुनाव के साथ विधानसभा चुनाव कराने में असमर्थ है, भले ही वह स्वीकार करता है कि चुनाव कराए जाने हैं।’’
निर्वाचन आयोग ने शनिवार को कहा कि जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव लोकसभा चुनाव के बाद होंगे क्योंकि दोनों चुनाव एक साथ कराना सुरक्षा की दृष्टि से व्यावहारिक नहीं है।
नेकां ने कहा कि उसे निर्वाचन आयोग से कोई उम्मीद नहीं थी, लेकिन यह उम्मीद थी कि निर्वाचन आयोग जम्मू-कश्मीर के लोगों को खुद पर शासन करने का अधिकार देगा।
नेकां के प्रवक्ता इमरान नबी ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘हम निर्वाचन आयोग से कोई उम्मीद नहीं कर रहे थे क्योंकि इससे कोई सकारात्मक संकेत नहीं मिल रहे थे। हम उम्मीद कर रहे थे कि वह लोगों को खुद पर शासन करने का अधिकार देगा। लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ।’’
उन्होंने कहा कि निर्वाचन आयोग दोनों चुनाव एक साथ करा सकता था और सुरक्षा और व्यय से संबंधित बहुत सारे संसाधन बचा सकता था। नेकां प्रवक्ता ने कहा कि निर्वाचन आयोग ने जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव को फिर से टाल दिया है।
पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) ने आरोप लगाया कि जम्मू-कश्मीर के लोगों को रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक स्थान देने से वंचित किया जा रहा है। पार्टी प्रवक्ता मोहित भान ने कहा, ‘‘ पिछले 10 वर्षों से जम्मू-कश्मीर के लोगों को लोकतंत्र में एक महत्वपूर्ण स्थान देने से रणनीतिक रूप से वंचित किया जा रहा है। यहां तक कि यहां पंचायत और नगरपालिका चुनाव भी नहीं हो रहे हैं जबकि लोग संसदीय चुनाव कराने की बात कर रहे हैं।’’
उन्होंने कहा कि यह निर्वाचन आयोग और अन्य संस्थानों पर है कि वे इस अवसर पर आगे आएं और दिखाएं कि वे सरकार से अधिक शक्तिशाली हैं। पीपीपी प्रवक्ता ने कहा, ‘‘ लेकिन दुर्भाग्य से एक बार फिर जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव पर कोई फैसला नहीं हुआ है।’’
उन्होंने आरोप लगाया कि ये संस्थाएं जम्मू-कश्मीर के लोगों को लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के प्रति विश्वास दिलाने में ‘विफल’ रही हैं।
पीडीपी नेता नईम अख्तर ने कहा कि जम्मू-कश्मीर को लोकतांत्रिक प्रक्रिया से ‘बहिष्कार’ का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने कहा, ‘‘ यह देखते हुए कि हमसे क्या छीन लिया गया है, हमें ज्यादा उम्मीदें नहीं थीं और (लोकसभा) चुनाव के बाद भी हमें ज्यादा उम्मीदें नहीं हैं। भाजपा को जब उचित लगेगा तब चुनाव कराएगी।’’
अख्तर ने कहा, ‘‘इससे हमें कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि कोई भी नयी सरकार (जम्मू-कश्मीर में) पिछली सरकारों जैसी नहीं होगी। मौजूदा व्यवस्था के तहत नयी सरकार एक गौरवशाली नगर पालिका भी नहीं होगी।’’
सज्जाद लोन नीत जम्मू-कश्मीर पीपुल्स कॉन्फ्रेंस (जेकेपीसी) ने कहा कि जब एक चुनाव कराया जा रहा है, तो निर्वाचन आयोग को इसके साथ दूसरा चुनाव भी कराना चाहिए था।
जेकेपीसी के प्रवक्ता अदनान अशरफ मीर ने कहा, ‘‘ हम उम्मीद कर रहे थे कि विधानसभा चुनाव भी साथ कराए जाएंगे। उन्हें दोनों चुनाव एक साथ कराने चाहिए थे।’’
उन्होंने लोकसभा चुनाव की घोषणा का स्वागत करते हुए कहा कि कम से कम पांच साल के अंतराल के बाद जम्मू-कश्मीर में कोई चुनाव हो रहा है।
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के वरिष्ठ नेता एम वाई तारिगामी ने कहा कि निर्वाचन आयोग द्वारा विधानसभा चुनाव की घोषणा नहीं करने से निराशा हुई है। उन्होंने कहा, ‘‘जम्मू-कश्मीर के लोगों के लिए यह एक बार फिर निराश करने वाला पल है। निर्वाचन आयोग के हालिया दौरे से कुछ हद तक उम्मीद जगी थी कि लंबे समय के बाद विधानसभा चुनाव हो सकते हैं। लेकिन उन्होंने फिर से बहाना बनाकर टाल दिया है।’’
जम्मू-कश्मीर अपनी पार्टी के उपाध्यक्ष गुलाम हसन मीर ने कहा कि ऐसा लगता है कि निर्वाचन आयोग जम्मू-कश्मीर के लोगों को सशक्त नहीं करना चाहता।
उन्होंने कहा, ‘‘हमें उम्मीद थी कि निर्वाचन आयोग जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव की घोषणा करेगा। लेकिन हमें निराशा हुई कि इसका कोई जिक्र नहीं था। ऐसा लगता है कि निर्वाचन आयोग यहां के लोगों को सशक्त नहीं बनाना चाहता।’’
भाषा धीरज