बाल विवाह में शामिल लोगों को अभियोजित करने से समस्या का समाधान नहीं होगा: न्यायालय
धीरज सुभाष
- 10 Jul 2024, 08:34 PM
- Updated: 08:34 PM
नयी दिल्ली, 10 जुलाई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को कहा कि बाल विवाह में संलिप्त लोगों को अभियोजित करने से इस समस्या का समाधान नहीं होगा क्योंकि इसके सामाजिक आयाम हैं। साथ ही, शीर्ष अदालत ने देश में बाल विवाह के मामलों में वृद्धि का आरोप लगाते हुए दायर की गई जनहित याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।
केंद्र ने दलील दी कि राज्यों में जागरूकता अभियान और प्रशिक्षण जैसे कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं।
इसपर, शीर्ष अदालत ने कहा, ‘‘ये कार्यक्रम, व्याख्यान जमीनी स्तर पर वास्तव में चीजें नहीं बदलते हैं।’’
गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) ‘सोसाइटी फॉर एनलाइटनमेंट एंड वॉलंटरी एक्शन’ ने 2017 में शीर्ष अदालत में जनहित याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम को बखूबी लागू नहीं किया जा रहा है।
प्रधान न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने याचिकाकर्ता के वकील और केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी की दलीलें सुनीं और इसके बाद फैसला सुरक्षित रख लिया।
पीठ ने कहा, ‘‘यह केवल अभियोजन का मामला नहीं है। बाल विवाह में शामिल लोगों पर मुकदमा चलाने से समस्या का समाधान नहीं होगा, क्योंकि इसके सामाजिक आयाम हैं।’’ अदालत ने इसी के साथ दोनों पक्षों के वकीलों से इस मुद्दे से निपटने के लिए आगे के उपाय सुझाने को कहा।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘हम यहां किसी की आलोचना करने के लिए नहीं हैं। यह एक सामाजिक मुद्दा है।’’ उन्होंने अतिरिक्त सॉलिसीटर जनरल से पूछा कि सरकार इस पर क्या कर रही है।
सुनवाई की शुरुआत में अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने पीठ को वर्तमान स्थिति के बारे में जानकारी दी और कहा कि आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र और असम जैसे राज्यों में बाल विवाह के अधिक मामले सामने आए हैं। उन्होंने कहा कि असम को छोड़कर पूर्वोत्तर के किसी राज्य से बाल विवाह का शायद ही कोई मामला आाया हो।
भाटी ने कहा कि दादरा नगर हवेली, मिजोरम और नगालैंड सहित पांच राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में बाल विवाह का कोई मामला सामने नहीं आया है। उन्होंने आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि गत तीन साल में स्थिति में सुधार आया है।
भाटी ने बताया कि 34 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में से 29 ने बाल विवाह से संबंधित आंकड़े मुहैया कराए हैं। उन्होंने कहा कि बाल विवाह में दोषसिद्धि के आंकड़े उपलब्ध नहीं है।
अतिरिक्त सॉलिसीटर जनरल ने कहा, ‘‘इस संबंध में डेटा यहां नहीं है। हम इसे प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन कृपया देखें, बहुत सुधार हुआ है। 2005-06 की तुलना में बाल विवाह के मामलों में 50 प्रतिशत की कमी आई है।’’
अदालत ने पूछा कि जिलाधिकारी और उप जिलाधिकारी जैसे अधिकारियों को बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारी के रूप में कार्य करने का अतिरिक्त प्रभार क्यों दिया जा रहा।
भाटी ने इसपर कहा कि ये अधिकारी जिलों में शक्तिशाली पदों पर होने के कारण बाल विवाह के मुद्दे से निपटने के लिए अधिक सक्षम हैं।
इससे पहले, शीर्ष अदालत ने महिला एवं बाल विकास मंत्रालय को बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम को क्रियान्वित करने के लिए उठाए गए कदमों का विवरण देते हुए स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया था।
भाषा धीरज