चार वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता की मौत, दो अस्पताल बच्ची के पिता को देंगे 12 लाख रुपये
दिलीप
- 07 Aug 2026, 05:45 PM
- Updated: 05:45 PM
नयी दिल्ली, सात अगस्त (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को गाजियाबाद के दो निजी अस्पतालों को उस चार वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता के परिवार को कुल 12 लाख रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया, जिसकी मौत कथित तौर पर समय पर आपात चिकित्सा सुविधा नहीं मिलने के कारण हुई थी।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने कहा कि यह मामला कानून में मौजूद सुरक्षा प्रावधानों और हकीकत में उनके अमल के बीच ''चिंताजनक अंतर'' को उजागर करता है। पीठ ने कहा कि वह गंभीर अपराधों के पीड़ितों के वास्ते अस्पतालों और जांच एजेंसियों के लिए व्यापक दिशा-निर्देश तैयार करेगी, ताकि ऐसी चूक दोबारा न हो।
शीर्ष अदालत ने विशेष जांच दल (एसआईटी) की रिपोर्ट का संज्ञान लेते हुए कहा कि गंभीर चोटों के बाद बच्ची करीब पांच घंटे तक जीवित थी, लेकिन उसे समय पर चिकित्सा सुविधा नहीं दी गई।
पीठ ने सेंट जोसेफ (मरियम) अस्पताल को 10 लाख रुपये और खजान सिंह मानवी हेल्थ केयर को 2 लाख रुपये चार सप्ताह के भीतर बच्ची के पिता को भुगतान करने का निर्देश दिया।
पीठ बच्ची के पिता, जो दिहाड़ी मजदूर हैं, की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में मार्च में हुई घटना की अदालत की निगरानी में जांच कराने की मांग की गई है।
उच्चतम न्यायालय ने इससे पहले उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा मामले को संभालने के तरीके और निजी अस्पतालों द्वारा बच्ची के इलाज से इनकार करने पर गंभीर चिंता जताते हुए एसआईटी का गठन किया था।
मामला 16 मार्च को बच्ची के साथ कथित दुष्कर्म और हत्या से जुड़ा है। आरोप है कि पड़ोसी उसे बहला-फुसलाकर ले गया था। याचिका के अनुसार, परिवार ने बच्ची को बेहोशी की हालत में और खून से लथपथ पाया था।
परिजन पहले उसे दोनों निजी अस्पतालों में ले गए, लेकिन आरोप है कि वहां उसका आपात स्थिति के बावजूद इलाज नहीं किया गया। इसके बाद उसे सरकारी अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।
एसआईटी रिपोर्ट में कहा गया कि हमले के बाद बच्ची करीब पांच घंटे तक जीवित थी और दोनों निजी अस्पतालों की ओर से तत्काल चिकित्सा सहायता नहीं दिए जाने से उसकी मौत हुई। यह रिपोर्ट अदालत में पेश की गई थी।
पीड़ित परिवार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता एन. हरिहरन ने कहा कि दोनों अस्पतालों के पास बच्ची की हालत को स्थिर करने के लिए जरूरी सुविधाएं थीं, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।
उन्होंने आरोप लगाया कि पहले अस्पताल ने सुविधा उपलब्ध होने के बावजूद आपात चिकित्सकों को बुलाने का प्रयास तक नहीं किया, जबकि दूसरे मल्टी-स्पेशियलिटी अस्पताल ने भी जीवन रक्षक इलाज उपलब्ध नहीं कराया।
हरिहरन ने कहा, ''यह अस्पतालों की स्पष्ट लापरवाही का मामला है। बच्ची जीवित बच सकती थी।'' उन्होंने अदालत से परिवार को मुआवजा देने और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए व्यवस्था में सुधार से जुड़े निर्देश जारी करने का आग्रह किया।
पीठ ने कहा कि यह ''अस्पतालों की घोर लापरवाही'' का मामला है। पीठ ने यह भी बताया कि वह पीड़ित परिवार को मुआवजा देने पर विचार कर रही थी।
हरिहरन ने पुलिस जांच में कथित खामियों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि प्राथमिकी दर्ज करते समय पुलिस ने पिता के बयान को सही तरीके से दर्ज नहीं किया और यौन अपराध के संकेतों के बावजूद शुरुआत में केवल हत्या की धारा लगाई गई।
उन्होंने प्राथमिकी दर्ज करने में करीब 30 घंटे की देरी का भी जिक्र किया और कहा कि असंवेदनशील जांच प्रक्रिया पीड़ित परिवार के दर्द को और बढ़ा देती है।
पीठ ने कहा कि गंभीर अपराधों के पीड़ितों से जुड़े मामलों में कई बार ''असंवेदनशील, अमानवीय और निम्न स्तर'' के तरीके से कार्रवाई की जाती है, जिससे पीड़ितों की परेशानी और बढ़ जाती है।
पीठ ने संस्थागत सुधारों की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत कानूनी सुरक्षा और अन्य प्रावधान मौजूद हैं, लेकिन उनका लाभ अक्सर केवल ''अदालतों के सीमित दायरे'' तक रह जाता है, जबकि हकीकत में पीड़ितों को अलग वास्तविकता का सामना करना पड़ता है।
पीठ ने कहा, ''कानून मौजूद है और कानून अपना काम कर रहा है। लेकिन एक अंतर है। सवाल यह है कि इस अंतर को कैसे कम किया जाए।''
प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि पुलिसकर्मियों को समय-समय पर प्रशिक्षण और संवेदनशीलता कार्यक्रमों के माध्यम से प्रशिक्षित करने की जरूरत है, ताकि सहानुभूति और त्वरित कार्रवाई आपराधिक जांच का अभिन्न हिस्सा बन सके।
पीठ ने कहा कि महत्वपूर्ण समय पर पीड़ितों से निपटने वाले पुलिस अधिकारियों को न्याय व्यवस्था में जनता के भरोसे को बनाए रखने के लिए संवेदनशीलता दिखानी चाहिए।
अदालत ने चिकित्सा संस्थानों के जीवन बचाने के दायित्व पर भी जोर देते हुए कहा कि अनुच्छेद 21 के तहत प्रत्येक अस्पताल का कर्तव्य है कि वह अन्य बातों पर विचार किए बिना आपात स्थिति में चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराए।
न्यायमूर्ति बागची ने एक अस्पताल के रवैये पर सवाल उठाते हुए कहा कि गंभीर रूप से घायल बच्ची को केवल दो किलोमीटर दूर दूसरे अस्पताल भेजना भी जानलेवा साबित हो सकता है।
उन्होंने कहा, ''जिस पीड़ित का बहुत अधिक खून बह रहा हो, उसके लिए दो किलोमीटर की दूरी भी घातक हो सकती है।'' उन्होंने कहा कि जैसे दिल का दौरा पड़ने पर मरीजों के लिए इलाज का एक ''स्वर्णिम समय'' (गोल्डन टाइम) होता है, वैसे ही चार वर्षीय बच्ची को दूसरे अस्पताल भेजने से पहले खून चढ़ाने या अन्य आपात इलाज की जरूरत थी।
न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि एसआईटी रिपोर्ट के अनुसार आपात चिकित्सकों को बुलाया जा सकता था, लेकिन ऐसा कोई प्रयास नहीं किया गया।
हरिहरन ने परिवार की पीड़ा का जिक्र करते हुए कहा कि बच्ची करीब पांच घंटे तक जीवित रही और उसके माता-पिता इलाज के लिए लगातार प्रयास करते रहे।
उच्चतम न्यायालय ने इससे पहले अप्रैल में गाजियाबाद पुलिस की प्राथमिकी दर्ज करने में देरी और जांच के ''असंवेदनशील रवैये'' की आलोचना की थी।
इसके बाद, शीर्ष अदालत ने मामले की जांच के लिए एसआईटी गठित की थी और उत्तर प्रदेश सरकार, संबंधित थाना प्रभारी, दोनों अस्पतालों तथा कार्यकारी मजिस्ट्रेट को नोटिस जारी किए थे।
भाषा मनीषा दिलीप
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