उच्च न्यायालय ने आरक्षित सीट संबंधी सरकारी चिकित्सकों की याचिका पर दिल्ली सरकार से जवाब मांगा
सुरेश
- 04 Aug 2026, 08:53 PM
- Updated: 08:53 PM
नयी दिल्ली, चार अगस्त (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने आरक्षित 'इन-सर्विस डीएनबी' (स्नातकोत्तर) सीटों पर प्रवेश के लिए काउंसिलिंग प्रक्रिया तत्काल शुरू करने के अनुरोध संबंधी चिकित्सकों की याचिका पर मंगलवार को दिल्ली सरकार से जवाब मांगा।
न्यायमूर्ति जसमीत सिंह ने दिल्ली सरकार के विभिन्न अस्पतालों में कार्यरत 14 'इन-सर्विस' चिकित्सकों की याचिका पर नोटिस जारी किया। याचिका में कहा गया है कि नीट-पीजी 2025 उत्तीर्ण करने के बावजूद संबंधित अधिकारियों ने वर्ष 2025 के शैक्षणिक सत्र के लिए 'इन-सर्विस' कोटे के तहत स्नातकोत्तर (पीजी) चिकित्सा पाठ्यक्रमों में प्रवेश की काउंसिलिंग प्रक्रिया अब तक शुरू नहीं की है।
अदालत ने दिल्ली सरकार को जवाब दाखिल करने का निर्देश देते हुए मामले की अगली सुनवाई 14 अगस्त के लिए निर्धारित की।
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता तन्वी दुबे ने दलील दी कि शैक्षणिक सत्र पहले ही शुरू हो चुका है, लेकिन दिल्ली सरकार की लगातार और अकारण शिथिलता के कारण याचिकाकर्ताओं के पूरे एक शैक्षणिक वर्ष के नुकसान का खतरा पैदा हो गया है, जिससे उन्हें अपूरणीय क्षति होगी।
याचिका में कहा गया है कि राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान परीक्षा बोर्ड (एनबीईएमएस) की 'डीएनबी ब्रॉड स्पेशियलिटी ट्रेनी' संबंधी नियमावली के अनुसार, एनबीईएमएस से मान्यता प्राप्त सरकारी अस्पतालों में व्यापक विशेषज्ञता वाली डीएनबी सीटों में से 50 प्रतिशत सीटें 'इन-सर्विस' अभ्यर्थियों के लिए आरक्षित हैं।
याचिका के अनुसार, ''प्रतिवादी संख्या-1 (दिल्ली सरकार) ने वर्ष 2025 के शैक्षणिक सत्र के लिए इन-सर्विस डीएनबी सीटों पर प्रवेश हेतु काउंसिलिंग प्रक्रिया शुरू और संचालित नहीं कर मनमानी की है तथा अपने सार्वजनिक दायित्व का उल्लंघन किया है। जबकि याचिकाकर्ता नीट-पीजी 2025 परीक्षा उत्तीर्ण कर चुके हैं और प्रतिवादी पूर्व के शैक्षणिक सत्रों में नियमित रूप से ऐसी काउंसिलिंग संचालित करता रहा है।''
याचिका में कहा गया कि वर्ष 2023 और 2024 के शैक्षणिक सत्रों में 'इन-सर्विस' डीएनबी सीटों के लिए काउंसिलिंग कराए जाने की परंपरा के आधार पर याचिकाकर्ताओं को यह वैध अपेक्षा थी कि वर्ष 2025 के शैक्षणिक सत्र में भी इसी प्रकार की काउंसिलिंग कराई जाएगी।
याचिका में कहा गया है कि बिना पूर्व सूचना के, कोई कारण बताए बिना और याचिकाकर्ताओं को सुनवाई का अवसर दिए बिना इस स्थापित व्यवस्था से अचानक हटना मनमाना कदम है तथा संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।
भाषा सुभाष सुरेश
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