सरदार सरोवर परियोजना : स्वतंत्र आयोग ने पुनर्वास और पर्यावरण की स्थिति पर उठाए सवाल
जितेंद्र
- 01 Aug 2026, 10:01 PM
- Updated: 10:01 PM
इंदौर (मध्यप्रदेश), एक अगस्त (भाषा) सरदार सरोवर बांध परियोजना में पुनर्वास व्यवस्था और पर्यावरणीय दायित्वों के पालन को लेकर खामियों का दावा करते हुए पटना उच्च न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश अंजना प्रकाश की अध्यक्षता में गठित स्वतंत्र निकाय 'जन आयोग' ने शनिवार को अपनी रिपोर्ट जारी की।
रिपोर्ट में नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण (एनडब्ल्यूडीटी) के करीब 46 वर्ष पुराने अंतिम निर्णय 'नर्मदा अवॉर्ड' की व्यापक एवं निष्पक्ष पुनर्समीक्षा कराने और राष्ट्रीय विस्थापित पुनर्वास आयोग गठित करने की सिफारिश की गई है।
यह रिपोर्ट ऐसे समय जारी की गई है, जब करीब महीने भर पहले सात जुलाई को केंद्र सरकार की पहल पर मध्यप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान ने 'नर्मदा अवॉर्ड' से लाभान्वित राज्यों के बीच लंबित भुगतान संबंधी विवादों के निपटारे को लेकर समझौते पर हस्ताक्षर किए थे।
गुजरात में नर्मदा नदी पर बना सरदार सरोवर बांध एक बहुउद्देशीय परियोजना है। इसे चारों राज्यों में सिंचाई, पेयजल आपूर्ति और जल विद्युत उत्पादन के लिए बनाया गया था।
'जन आयोग' की इंदौर में जारी 255 पन्नों की रिपोर्ट में कहा गया है कि मध्यप्रदेश के 15,946 परिवारों को 'बैकवॉटर' (बांध की दीवार से टकराकर लौटने वाला पानी) स्तर के पुनर्निर्धारण के कारण पुनर्वास लाभों से वंचित कर दिया गया।
रिपोर्ट के अनुसार इनमें से अनेक परिवार वर्षों से अस्थायी टीनशेड, सरकारी भवनों अथवा क्षतिग्रस्त मकानों में रहने को विवश हैं।
रिपोर्ट में दावा किया गया कि सरदार सरोवर परियोजना से जुड़े कई मूल वादे अब तक पूरे नहीं हुए हैं।
रिपोर्ट के अनुसार गुजरात, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र के अनेक क्षेत्रों को सिंचाई, पेयजल और बिजली का अपेक्षित लाभ नहीं मिल सका है।
रिपोर्ट में दावा किया गया कि गुजरात में लगभग 5,000 किलोमीटर लंबी नहरों का निर्माण अब भी अधूरा है तथा कच्छ और सौराष्ट्र जैसे सर्वाधिक जरूरतमंद क्षेत्रों तक पर्याप्त पानी नहीं पहुंच सका, जबकि राज्य के बड़े शहरों और औद्योगिक इकाइयों को अपेक्षाकृत अधिक जल उपलब्ध कराया गया है।
रिपोर्ट में मध्यप्रदेश के साथ ही महाराष्ट्र और गुजरात में पुनर्वास की स्थिति पर सवाल उठाते हुए कहा गया है कि अनेक पुनर्वास स्थलों पर पेयजल, सड़क, स्वास्थ्य केंद्र, निकासी व्यवस्था, चरागाह और श्मशान जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं।
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि यह 'नर्मदा अवॉर्ड', पुनर्वास नीति और न्यायालयों के आदेशों का उल्लंघन है।
'जन आयोग' की अध्यक्ष एवं पटना उच्च न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश अंजना प्रकाश ने संवाददाता सम्मेलन में कहा कि सरदार सरोवर बांध परियोजना में मछुआरों, कुम्हारों और अन्य ऐसे समुदायों के नुकसान का समुचित आकलन नहीं किया गया जिनका भूमि पर स्वामित्व नहीं था, लेकिन परियोजना से उनकी आजीविका प्रभावित हुई।
उन्होंने कहा कि ऐसे समुदायों के पुनर्वास और अधिकारों पर भी गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
'जन आयोग' की रिपोर्ट में पुनर्वास प्रक्रिया में सामने आए कथित भ्रष्टाचार के मामलों पर चिंता जताते हुए दावा किया गया कि मध्यप्रदेश में झा आयोग द्वारा कई अधिकारियों और कर्मचारियों को दोषी ठहराए जाने के बावजूद प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई।
रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि वैकल्पिक वनीकरण, जलग्रहण क्षेत्र उपचार और अन्य पर्यावरणीय दायित्व अपेक्षित स्तर पर पूरे नहीं किए गए तथा अवैध रेत खनन, औद्योगिक प्रदूषण और शहरी अपशिष्ट के कारण नर्मदा नदी और जलाशय की स्थिति लगातार बिगड़ रही है।
नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण (एनडब्ल्यूडीटी) का गठन 1969 में अंतरराज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम 1956 के तहत मध्यप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के बीच नर्मदा नदी के जल बंटवारे के मसले के हल के लिए किया गया था।
एनडब्ल्यूडीटी ने पानी के बंटवारे और परियोजना लागत संबंधी अपना अंतिम निर्णय 'नर्मदा अवॉर्ड' दिसंबर 1979 में पारित किया था।
स्वतंत्र आयोग की रिपोर्ट पर मध्यप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान की सरकारों की ओर से तुरंत कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
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