मानवीय भावनाओं की सूक्ष्म पड़ताल करता कहानी संग्रह ‘रब्बी’
आशीष नरेश दिलीप
- 09 Jul 2024, 04:25 PM
- Updated: 04:25 PM
नयी दिल्ली, नौ जुलाई (भाषा) ग्रामीण क्षेत्रों और महानगरों में आम लोगों के रोजमर्रा के संघर्ष, उनके सपनों के बिखराव, जाति, धर्म और विस्थापन की चुनौतियों की दास्तां कहता है पत्रकार और लेखिका नरेश कौशिक का कहानी संग्रह ‘रब्बी’।
प्रभात प्रकाशन की सहायक कंपनी प्रतिभा प्रतिष्ठान द्वारा प्रकाशित किताब ‘‘रब्बी’’ 11 लघु कथाओं का संग्रह है, जो जाति, वर्ग, धर्म, प्रवास और बेरोजगारी की कुरूप वास्तविकताओं से जूझ रहे ग्रामीण और शहरी समाज के रोजमर्रा के जीवन को गहराई से छूता है।
अपनी पहली किताब के बारे में कौशिक ने कहा कि उनकी अधिकतर कहानियां ‘‘वंचितों की पीड़ा’’ को बयां करती हैं।
कौशिक ने कहा, ‘‘किताब की अधिकांश कहानियां समाज के वंचित और शोषित वर्ग की पीड़ा के साथ-साथ पारिवारिक और सामाजिक रिश्तों के मनोविज्ञान पर आधारित हैं। जहां तक कहानियों के पीछे की प्रेरणा का सवाल है, जब व्यवस्था आपके सामने सवाल उठाती है, तो कई बार ऐसे सवाल कहानियों का रूप ले लेते हैं।’’
लेखिका ने कहा, ‘‘मेरी अधिकांश कहानियां भी सवाल उठाती हैं।’’
किताब की पहली कहानी ‘कंजिया’ दिल्ली जैसे शहर में एक प्रवासी मजदूर के संघर्ष को बयां करती है, जो अपनी बेटी के लिए लहंगा खरीदने का सपना देखता है। ‘रब्बी’ 1947 की आजादी के स्याह दिनों की याद दिलाती है, जब रातों रात पड़ोसी एक दूसरे के दुश्मन बन जाते हैं।
‘आ अब लौट चलें’ आपाधापी और भावनात्मक अवलंब से रिक्त होते महानगर से घबराकर अपनी जड़ों की तलाश में गांव में बसने की इच्छा रखने वाले एक सेवानिवृत्त बुजुर्ग की कहानी है। कहानी बिंबों में चलती है और पारिवारिक रिश्तों पर पड़े तृष्णा और लोलुपता के आवरण को परत दर परत अनावृत करती चली जाती है।
‘गांठें’ और ‘जलकुंभी’ जैसी कहानियां सूक्ष्म मनोभाव पर आधारित हैं।
संग्रह की एक और कहानी ‘मोलकी’ हरियाणा में विषम लिंगानुपात और विवाह के लिए दूसरे राज्यों से युवतियों को खरीद कर लाए जाने की कुप्रथा पर आधारित है। कुप्रथा के साथ ही कहानी भावनात्मक, भाषायी और सांस्कृतिक विस्थापन की पीड़ा को भी बयान करती है।
इस कहानी का दिल्ली विश्वविद्यालय के विभिन्न कॉलेजों और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी)-रुड़की समेत अन्य संस्थानों में नाट्य मंचन हो चुका है।
किताब की कीमत 300 रुपये है और यह विभिन्न ऑनलाइन माध्यम के साथ स्टोर में भी उपलब्ध है।
भाषा आशीष नरेश