जल सुरक्षा के लिए आपूर्ति और मांग दोनों पक्षों पर काम जरूरी: विशेषज्ञ
शोभना
- 15 Jul 2026, 10:22 AM
- Updated: 10:22 AM
(अपर्णा बोस)
नयी दिल्ली, 15 जुलाई (भाषा) मानसून आने के बावजूद देश के आधे से अधिक जलाशय अब भी सूखे पड़े हैं और ऐसे में जल सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पानी की आपूर्ति बढ़ाने के साथ-साथ उसकी मांग का बेहतर प्रबंधन करना भी जरूरी है। 'ऊर्जा एवं संसाधन संस्थान' (टेरी) के जल प्रभाग के एक सलाहकार ने यह बात कही।
केंद्रीय जल आयोग के आंकड़ों के अनुसार, देश के 166 प्रमुख जलाशयों में इस समय उनकी कुल भंडारण क्षमता का 32.38 प्रतिशत पानी है। पिछले सप्ताह यह आंकड़ा 26 प्रतिशत था।
जलवायु परिवर्तन के बीच भारत में जल भंडारण और मांग प्रबंधन के प्रयास देश का जल भविष्य सुरक्षित कर सकते हैं या नहीं, इस बारे में पूर्व भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) अधिकारी और टेरी के जल प्रभाग के सलाहकार श्यामल सरकार ने कहा कि जल सुरक्षा के लिए आपूर्ति और मांग दोनों पक्षों पर काम करना जरूरी है क्योंकि घरेलू, औद्योगिक और कृषि क्षेत्रों में पानी की मांग उपलब्ध आपूर्ति से अधिक है।
जल संसाधन मंत्रालय में सचिव रह चुके सरकार ने 'पीटीआई- भाषा' से कहा, ''आपूर्ति के स्तर पर जल भंडारण सबसे महत्वपूर्ण है। बड़े बांधों में इस समय करीब 250 अरब घन मीटर पानी है और सरकार की जारी पहलों से इसमें काफी वृद्धि हो सकती है। मांग के स्तर पर सवाल यह है कि आपूर्ति कम पड़ने पर जरूरतों का प्रबंधन कैसे किया जाए। भारत सहित अधिकतर देशों ने इस पहलू की लंबे समय तक अनदेखी की और केवल आपूर्ति बढ़ाने के उपायों पर ध्यान दिया।''
सरकार के अनुसार, देश में प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता 1950 में करीब 5,000 घन मीटर थी, जो अब घटकर लगभग 1,500 घन मीटर रह गई है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रति व्यक्ति 1,700 घन मीटर से कम पानी को 'पानी की उपलब्धता पर दबाव की स्थिति' माना जाता है और भारत इस सीमा को पहले ही पार कर चुका है। देश अब प्रति व्यक्ति 1,000 घन मीटर की उस सीमा की ओर बढ़ रहा है, जिसे 'पानी की भारी कमी' की स्थिति माना जाता है।
उन्होंने पानी की मांग का उदाहरण देते हुए कहा कि एक व्यक्ति को पीने के लिए प्रतिदिन दो से तीन लीटर पानी की जरूरत होती है लेकिन दिल्ली में प्रति व्यक्ति रोजाना करीब 165 लीटर पानी की आपूर्ति की जाती है। उन्होंने कहा कि शेष पानी नहाने, कपड़े धोने और अन्य कामों में इस्तेमाल होता है तथा उसमें से अधिकतर का दोबारा उपयोग या शोधन नहीं किया जाता।
उन्होंने इसकी तुलना इजराइल से की, जहां 60 से 70 प्रतिशत पानी को समुद्र में बहने देने के बजाय उसका कृषि कार्यों में दोबारा उपयोग किया जाता है।
सरकार ने कहा, ''नीति आयोग का अनुमान है कि 2050 तक भारत में पानी की मांग उपलब्ध आपूर्ति से दोगुनी हो जाएगी। इस अंतर को कम करने के लिए बेहतर जल प्रबंधन के जरिए मांग घटानी होगी और पानी जमा करने की क्षमता भी मौजूदा स्तर से अधिक करनी होगी।''
उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन के कारण स्थिति अधिक गंभीर हो गई है और हाल के वर्षों में मानसून की बारिश अनियमित हुई है।
पूर्व आईएएस अधिकारी ने कहा, ''पर्याप्त जल भंडारण नहीं होने पर पानी की कमी से आर्थिक वृद्धि और पेयजल आपूर्ति प्रभावित होती है। इसका असर भूजल पर भी पड़ता है, क्योंकि सतही जल से ही भूजल का स्तर दोबारा बढ़ता है।''
विज्ञान एवं पर्यावरण केंद्र (सीएसई) की सुष्मिता सेनगुप्ता से सवाल किया गया कि शहरों में जल संबंधी बुनियादी ढांचे में व्यावहारिक रूप से क्या बदलाव किए जाने चाहिए, जिसके जवाब में उन्होंने कहा कि 'पीटीआई- भाषा' से कहा कि शहरों को स्थानीय जलाशयों की सफाई शुरू करनी चाहिए, अपशिष्ट जल का उचित प्रबंधन करना चाहिए और पानी के टिकाऊ स्रोत के रूप में स्थानीय स्तर की विकेंद्रीकृत व्यवस्थाओं को फिर से विकसित करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि दशकों की अनदेखी के कारण भूजल स्तर घट गया है और स्थानीय जल स्रोत प्रदूषित हो गए हैं तथा जब तक शहर पानी के टिकाऊ स्रोत के रूप में स्थानीय और विकेंद्रीकृत व्यवस्थाओं को दोबारा विकसित नहीं करेंगे, तब तक इस समस्या का समाधान नहीं होगा।
भाषा सिम्मी शोभना
शोभना
1507 1022 दिल्ली