भोजशाला परिसर संबंधी फैसले के खिलाफ याचिकाओं पर सुनवाई करेगा न्यायालय
नरेश
- 13 Jul 2026, 02:16 PM
- Updated: 02:16 PM
(फाइल फोटो के साथ)
नयी दिल्ली, 13 जुलाई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती देने वाली याचिकाओं को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने पर सहमति जताई जिसमें विवादित भोजशाला परिसर को देवी सरस्वती को समर्पित मंदिर बताया गया था।
मुस्लिम अपीलकर्ताओं की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील हुजेफा अहमदी और वकील निजाम पाशा ने प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ से आग्रह किया कि इन याचिकाओं पर तत्काल सुनवाई जरूरी है।
प्रधान न्यायाधीश ने अपीलकर्ताओं के वकीलों से याचिकाओं में मौजूद कमियों को दूर करने को कहा और उन्हें भरोसा दिलाया कि जल्द किसी पीठ के सामने सुनवाई के लिए इन्हें सूचीबद्ध किया जाएगा।
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने 15 मई को फैसला सुनाया था कि धार जिले में विवादित भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद परिसर देवी सरस्वती को समर्पित एक मंदिर है। अदालत ने इसके अलावा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के दशकों पुराने उस आदेश को भी रद्द कर दिया जिसमें मुस्लिम समुदाय को इस जगह पर शुक्रवार की नमाज पढ़ने की इजाजत दी गई थी।
उच्च न्यायालय ने यह भी कहा था कि केंद्र और एएसआई भोजशाला परिसर के प्रशासन और प्रबंधन के बारे में फैसला ले सकते हैं।
हिंदू समुदाय भोजशाला को देवी सरस्वती को समर्पित मंदिर मानता है जबकि मुस्लिम पक्ष 11वीं सदी की इस इमारत को कमाल मौला मस्जिद कहता है। विवादित परिसर एएसआई के संरक्षण में है।
मुस्लिम पक्ष ने उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ अपील दायर की है।
हिंदू पक्षों ने उच्चतम न्यायालय में 'कैविएट' (पूर्व सूचना याचिका) दायर की है जिसमें कहा गया है कि भोजशाला परिसर विवाद मामले में उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ किसी भी अपील पर उनकी बात सुने बिना कोई आदेश जारी नहीं किया जाए।
न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की उच्च न्यायालय की खंड पीठ ने अपने फैसले में कहा कि 11वीं सदी के इस स्मारक का धार्मिक स्वरूप वैज्ञानिक साक्ष्यों पर आधारित है। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि मुस्लिम पक्ष जिले में मस्जिद निर्माण के लिए अलग जमीन उपलब्ध कराने के संबंध में मध्य प्रदेश सरकार से संपर्क कर सकता है।
पीठ ने अपने आदेश में कहा, ''भोजशाला परिसर और कमाल मौला मस्जिद के विवादित क्षेत्र का धार्मिक स्वरूप देवी वाग्देवी (सरस्वती) के मंदिर वाली भोजशाला का है।''
पीठ ने आदेश दिया कि भोजशाला क्षेत्र को 1958 के अधिनियम के तहत तीन मार्च, 1904 से ''संरक्षित स्मारक'' माना जाएगा।
अदालत ने निर्देश दिया कि धार्मिक प्रवेश के नियमन, संरक्षण और रखरखाव पर एएसआई का पूर्ण पर्यवेक्षण अधिकार होगा। साथ ही, अदालत ने केंद्र सरकार और एएसआई को भोजशाला मंदिर और संस्कृत अध्ययन से जुड़े मामलों के प्रशासन एवं प्रबंधन के लिए निर्णय लेने को कहा।
उच्च न्यायालय ने कहा था कि केंद्र सरकार लंदन संग्रहालय से देवी सरस्वती की प्रतिमा को वापस लाने और उसे परिसर में पुनः स्थापित करने के संबंध में कुछ याचिकाकर्ताओं के अभ्यावेदनों पर विचार कर सकती है।
इस आदेश ने एएसआई के अप्रैल 2003 के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसके तहत हिंदुओं को मंगलवार को पूजा करने और मुसलमानों को शुक्रवार को नमाज अदा करने की अनुमति दी गई थी।
उच्च न्यायालय के आदेश में अयोध्या विवाद से जुड़ी पृष्ठभूमि और कानूनी दलीलों का जिक्र किया गया था क्योंकि कई याचिकाकर्ताओं ने उच्चतम न्यायालय के फैसले का हवाला दिया था। अदालत ने मध्य प्रदेश सरकार से यह भी कहा कि वह मस्जिद बनाने के लिए धार जिले में जमीन आवंटित करने के याचिकाकर्ताओं के अनुरोध पर विचार करे।
अदालत ने कहा कि पुरातत्व और ऐतिहासिक तथ्यों से यह ''पूरी तरह स्पष्ट है कि संबंधित इमारत एक हिंदू मंदिर और संस्कृत भाषा के अध्ययन का केंद्र है।''
भाषा सुरभि नरेश
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