एनएफआरए राजेश एक्सपोर्ट्स मामले को देख रहा, जांच की समय-सीमा नहीं बताना मुश्किल: नितिन गुप्ता
अजय
- 07 Jul 2026, 04:38 PM
- Updated: 04:38 PM
मुंबई, सात जुलाई (भाषा) राष्ट्रीय वित्तीय रिपोर्टिंग प्राधिकरण (एनएफआरए) के चेयरमैन नितिन गुप्ता ने मंगलवार को कहा कि एनएफआरए राजेश एक्सपोर्ट्स में राजस्व से जुड़ी गलत जानकारी देने के मामले की जांच कर रहा है, लेकिन जांच पूरी होने की समय-सीमा बताना अभी संभव नहीं है।
गुप्ता ने यहां उद्योग मंडल फिक्की के एक कार्यक्रम में कहा, '' हमने अपनी प्रक्रिया शुरू कर दी है।''
उन्होंने इस मामले पर कोई भी जानकारी या टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। यह पूछे जाने पर कि जांच कबतक पूरी होगी, इस बारे में भी उन्होंने कुछ नहीं कहा।
गौरतलब है कि पिछले महीने, पूंजी बाजार नियामक सेबी ने एक आदेश जारी किया था जिसमें पाया गया कि राजेश एक्सपोर्ट्स ने लंबे समय तक राजस्व के गलत आंकड़े दिखाए थे और कुल गड़बड़ी 15.5 लाख करोड़ रुपये आंकी गई थी।
बाद की रिपोर्ट के अनुसार, सेबी ने लेखा परीक्षा पेशे को विनियमिति करने वाले एनएफआरए को पत्र लिखकर उस कंपनी के लेखा परीक्षकों की जांच करने को कहा था।
गुप्ता ने मंगलवार को देश में प्रवर्तक संचालित कंपनियों में निदेशक मंडल (बोर्ड) की वास्तविक स्वतंत्रता की वकालत की। उन्होंने कहा कि चूंकि एआई (कृत्रिम मेधा) कॉरपोरेट फैसलों को प्रभावित कर रहा है, इसलिए किसी मुद्दे पर गंभीरता से विचार करना जरूरी है।
उन्होंने वित्त और ऑडिटिंग में एआई की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि वित्तीय रिपोर्टिंग में हर महत्वपूर्ण फैसला लोगों के हाथ में ही रहना चाहिए।
गुप्ता ने कहा कि अगर बोर्ड के सदस्य प्रबंधन के फैसलों पर सवाल उठाने को तैयार नहीं हैं या ऐसा करने में असमर्थ हैं तो सिर्फ कागजी स्वतंत्रता का कोई मतलब नहीं है।
उन्होंने कहा, ''भारत में, चूंकि कंपनियां प्रवर्तक-संचालित होती हैं और प्रबंधन के पास ही मुख्य स्वामित्व होता है, इसलिए स्वतंत्रता का औपचारिक ढांचा तो पूरी तरह मौजूद हो सकता है। लेकिन असल में कोई ठोस सवाल नहीं उठाया जाता क्योंकि सामाजिक नियम, जानकारी के लिए दूसरों पर निर्भरता और बोर्ड के गठन की व्यावहारिक स्थितियां इसके आड़े आ सकती हैं।''
गुप्ता ने कहा, ''हमें असल स्वतंत्रता की तलाश करनी है और असल आजादी कागजों पर नहीं, बल्कि व्यवहार में होनी चाहिए। इसके लिए संस्था की ओर से सवाल उठाने की सच्ची इच्छाशक्ति और वास्तविक अनुमति का होना जरूरी है।''
गुप्ता ने कहा कि एआई ने ऐसी संस्कृति को और भी जरूरी बना दिया है, क्योंकि ये प्रणाली ऐसी भरोसेमंद और विश्वसनीय रिपोर्ट बना सकती हैं जिन्हें सही नतीजे समझा जा सकता है।
उन्होंने कहा, ''उसे ही सही मान लिया जा सकता है...। बोर्ड और ऑडिटर को एआई से तैयार चीजों को सिर्फ इसलिए नहीं मान लेना चाहिए कि वे भरोसेमंद लगते हैं, बल्कि उन्हें उन पर सवाल उठाने की आदत डालनी चाहिए।''
गुप्ता ने कहा कि कंपनी संचालन कितना असरदार होगा, यह नियमों के होने से अधिक इस बात पर निर्भर करता है कि उन्हें किस भावना के साथ लागू किया जा रहा है।
भाषा रमण अजय
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