गृह मंत्रालय ने कोलकाता के पुलिस आयुक्त, पुलिस उपायुक्त के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की
देवेंद्र नेत्रपाल
- 07 Jul 2024, 08:47 PM
- Updated: 08:47 PM
(सुदीप्तो चौधरी)
कोलकाता, सात जुलाई (भाषा) पश्चिम बंगाल के राज्यपाल कार्यालय को अफवाह फैलाकर कथित तौर पर बदनाम करने के मामले में कोलकाता के पुलिस आयुक्त विनीत गोयल और एक पुलिस उपायुक्त के खिलाफ गृह मंत्रालय ने अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की है। केंद्र सरकार के एक अधिकारी ने यह जानकारी दी।
उन्होंने कहा कि गृह मंत्रालय ने यह कार्रवाई पश्चिम बंगाल के राज्यपाल सी.वी. आनंद बोस द्वारा गोयल और कोलकाता पुलिस उपायुक्त (मध्य) इंदिरा मुखर्जी के संबंध एक रिपोर्ट के सौंपे जाने के बाद शुरू की है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि संबंधित अधिकारी ‘‘इस तरह काम कर रहे हैं, जो किसी लोकसेवक के लिए पूरी तरह से अनुचित है।’’
केंद्र सरकार के अधिकारी ने कहा कि बोस ने जून के अंतिम सप्ताह में गृह मंत्री को सौंपी अपनी रिपोर्ट में इस मुद्दे को उठाया है कि कोलकाता पुलिस के अधिकारी चुनाव के बाद हुई हिंसा के पीड़ितों को उनसे मिलने नहीं दे रहे हैं, जबकि उन्होंने इसके लिए उन्हें जरूरी अनुमति दे दी थी।
अधिकारी ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘गृह मंत्रालय ने बंगाल के राज्यपाल बोस द्वारा प्रस्तुत विस्तृत रिपोर्ट के आधार पर आईपीएस अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की है।’’
उन्होंने बताया कि पत्र की प्रतियां चार जुलाई को राज्य सरकार को भेज दी गई थीं।
अधिकारी ने कहा कि बंगाल के राज्यपाल ने राजभवन में तैनात अन्य पुलिस अधिकारियों पर अप्रैल-मई 2024 के दौरान एक महिला कर्मचारी द्वारा लगाए गए मनगढ़ंत आरोपों को बढ़ावा देने का भी आरोप लगाया।
उन्होंने कहा, ‘‘इन आईपीएस अधिकारियों ने अपने कृत्यों से न केवल राज्यपाल के कार्यालय को कलंकित किया है, बल्कि इस तरह से काम किया है, जो किसी लोकसेवक के लिए पूरी तरह से अनुचित है।’’
बोस ने अपनी रिपोर्ट में कोलकाता पुलिस की उस कथित नयी परंपरा का उल्लेख किया है, जिसमें राज्यपाल कार्यालय की आपत्ति के बावजूद राजभवन के कर्मचारियों को पहचान पत्र जारी करने और प्रवेश तथा निकास के समय उनकी तलाशी लेने की बात कही गई है।
अधिकारी ने कहा, ‘‘पश्चिम बंगाल के विभिन्न हिस्सों से हिंसा के पीड़ितों के एक प्रतिनिधिमंडल को, जिसमें विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी भी शामिल थे, बोस से मिलने से रोकना राज्यपाल के संवैधानिक अधिकार का अनादर है।’’
उन्होंने कहा कि यह परेशान करने वाली बात है कि पीड़ितों को राज्यपाल से मिलने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
राजभवन से पुलिस की टुकड़ी हटाने संबंधी बोस के 13 जून के निर्देश पर कोलकाता पुलिस की ‘‘पूर्ण चुप्पी’’ का उल्लेख करते हुए अधिकारी ने कहा, ‘‘इसे आदेशों की अवहेलना के रूप में देखा गया है’’।
उन्होंने कहा, ‘‘जून के मध्य से, राजभवन में तैनात कोलकाता पुलिस ने राज्यपाल की जानकारी और सहमति के बिना एकतरफा रूप से ‘सुरक्षा तंत्र’ स्थापित कर दिया, जिससे प्रभावी रूप से पूरे प्रतिष्ठान को ‘निगरानी’ में रखा गया।’’
बोस की रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि प्रारंभिक आंतरिक जांच में पाया गया कि राजभवन की एक पूर्व कर्मचारी द्वारा उनके खिलाफ लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोप ‘‘पूर्व-लिखित पटकथा’’ का हिस्सा थे।
रिपोर्ट में कहा गया है, ‘‘कोलकाता पुलिस आयुक्त और इंदिरा मुखर्जी ने तेजी से एक विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया और मीडिया को लगातार जानकारी दी, जिससे यह गलत धारणा बनी कि राज्यपाल पर आपराधिक मुकदमा चलाया जा सकता है।’’
बोस ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को पत्र लिखकर गोयल और मुखर्जी के खिलाफ कार्रवाई का अनुरोध किया था, लेकिन कोई कदम नहीं उठाया गया और न ही उनके (मुख्यमंत्री) कार्यालय से कोई सूचना दी गई।
राज्यपाल ने चोपड़ा हिंसा के पीड़ितों से मिलने के लिए हाल में सिलीगुड़ी के अपने दौरे का भी उल्लेख किया तथा राज्य के कुछ अधिकारियों के आचरण पर सवाल उठाया।
उन्होंने कहा, ‘‘उनका आचरण अखिल भारतीय सेवा नियमावली के अनुरूप नहीं है। राज्य सरकार को विधिवत जानकारी दी गई। प्रोटोकॉल का खुला उल्लंघन करते हुए दार्जिलिंग के जिलाधिकारी और सिलीगुड़ी के पुलिस आयुक्त ने हालांकि राज्यपाल से मुलाकात नहीं की।’’
संपर्क करने पर गोयल ने कहा कि उन्हें केंद्रीय गृह मंत्रालय की कार्रवाई के बारे में कोई जानकारी नहीं है।
गोयल ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘मुझे इस बारे में कोई जानकारी नहीं है। यदि कुछ आया है तो वह राज्य सरकार के पास गया होगा।’’
मुखर्जी ने कहा कि उन्हें भी इस बारे में कोई जानकारी नहीं है।
राज्य की गृह सचिव नंदिनी चक्रवर्ती को फोन किए जाने पर कोई जवाब नहीं मिला।
भाषा
देवेंद्र