पहचान की राजनीति के फिर से उभार के कारण हमारी ताकत कम हुई: माकपा
हक हक पवनेश
- 06 Jul 2024, 08:23 PM
- Updated: 08:23 PM
नयी दिल्ली, छह जुलाई (भाषा) मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि जिन राज्यों में इसकी मजबूत उपस्थिति रही है वहां इसके आधार का कमजोर होना चिंता का विषय है।
इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पहचान की राजनीति के फिर से उभार और "पार्टी के खिलाफ वर्षों के दमन और हमलों" के कारण भी माकपा की ताकत कम हुई।
पार्टी की निर्णय लेने वाली सर्वोच्च इकाई केंद्रीय समिति ने वर्ग-आधारित राजनीति के साथ पहचान की राजनीति के प्रतिकूल प्रभाव का मुकाबला करने के लिए उत्पीड़ित समूहों से संबंधित सामाजिक मुद्दों को उठाने पर जोर दिया है।
नई दिल्ली में 28-30 जून को हुई बैठक के दौरान केंद्रीय समिति की रिपोर्ट को अनुमोदित किया गया था। इसमें इस बात का उल्लेख भी किया गया है कि केरल के कई लोकसभा क्षेत्रों में माकपा ने पारंपरिक आधार खो दिया है और यह भाजपा के साथ चला गया है।
माकपा की केंद्रीय समिति ने कहा, ‘‘यह स्पष्ट है कि हमारे जनाधार का क्षरण बहुत समय पहले देखा गया था, जो अब भी जारी है। चिंता का विषय यह है कि हमारे मजबूत राज्यों में हमारा जनाधार/चुनावी आधार कमजोर हुआ है।’’
उसने कहा कि पार्टियों की राज्य समितियों द्वारा की गई प्रारंभिक समीक्षा इस गिरावट की पुष्टि करती है, हालांकि इस बात का कोई आकलन नहीं है कि उनके प्राथमिक समर्थकों की क्या स्थिति है? मजदूर वर्ग, गरीब और मध्यम किसानों और खेतिहर मजदूरों ने वास्तव में मतदान किया।
केंद्रीय समिति ने रिपोर्ट में कहा, ‘‘ केरल में भाजपा के नेतृत्व वाले राजग का वोट शेयर पिछले दस वर्षों में लगभग दोगुना हो गया है। 2014 में 10.08 प्रतिशत था जो 2024 में 19.2 प्रतिशत हो गया, जबकि एलडीएफ का वोट शेयर 2014 में 40.2 प्रतिशत से घटकर 2024 में 33.35 प्रतिशत हो गया।’’
हालाँकि, इसमें कहा गया है कि हाल ही में हुए लोकसभा चुनावों में यूडीएफ (केरल में कांग्रेस के नेतृत्व वाला गठबंधन) की जीत और एलडीएफ (केरल में माकपा के नेतृत्व वाला गठबंधन) की हार का मुख्य कारण यह है कि लोगों के एक वर्ग, विशेष रूप से अल्पसंख्यकों, को केंद्र में भाजपा को हराने का लक्ष्य केवल कांग्रेस द्वारा ही संभव लगता था।’’
केंद्रीय समिति ने कहा, ‘‘यह वही रुझान था जो 2019 के चुनाव में देखा गया जब राहुल गांधी ने वायनाड निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ा था।’’
रिपोर्ट में कहा गया है, ‘‘चुनाव परिणामों की एक परेशान करने वाली बात यह है कि कई निर्वाचन क्षेत्रों में भाजपा के कारण हमारे पारंपरिक आधार का क्षरण हुआ है।’’
माकपा की केंद्रीय समिति ने पश्चिम बंगाल के संदर्भ में कहा कि राज्य के कई क्षेत्रों में पार्टी के वोट बैंक में वृद्धि के कारण भाजपा हारी, हालांकि उसने यह स्वीकार किया कि इस प्रदेश में माकपा का संगठन कमजोर हो गया है, जो 12-14 प्रतिशत बूथों पर पार्टी के पोलिंग एजेंट के नहीं होने के रूप में परिलक्षित हुआ।
केंद्रीय समिति ने पश्चिम में पार्टी की स्थिति के बारे में कहा, ‘‘ऐसे कई क्षेत्र हैं जहां लंबे समय से पार्टी अस्तित्व में नहीं है। वर्ग-आधारित आंदोलनों और संगठन के बिना हमारे राजनीतिक प्रभाव और चुनावी आधार को फिर से स्थापित करना संभव नहीं होगा।’’
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