यौन हिंसा के मामलों को धन के भुगतान के आधार पर हुए समझौतों की वजह से रद्द नहीं किया जा सकता: अदालत
देवेंद्र दिलीप
- 02 Jul 2024, 10:35 PM
- Updated: 10:35 PM
नयी दिल्ली, दो जुलाई (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा है कि यौन हिंसा के आरोपों से जुड़े आपराधिक मामलों को पैसों के भुगतान के आधार पर हुए समझौतों के कारण रद्द नहीं किया जा सकता, क्योंकि ऐसा करने का मतलब होगा कि “न्याय बिकाऊ है।’’
उच्च न्यायालय ने कहा कि भले ही यौन हिंसा के मामले में पक्षकारों के बीच समझौता हो गया हो, लेकिन वे अपने अधिकार के तौर पर प्राथमिकी रद्द करने की मांग नहीं कर सकते।
अदालत ने यह टिप्पणी बलात्कार के एक आरोपी की याचिका को खारिज करते हुए की। याचिका में एक महिला द्वारा दर्ज कराई गई प्राथमिकी को इस आधार पर रद्द करने का अनुरोध किया गया था कि मामले को पक्षकारों द्वारा सौहार्दपूर्ण तरीके से सुलझा लिया गया है और वह (महिला) 1.5 लाख रुपये का भुगतान किये जाने पर समझौता करने के लिए सहमत हो गई हैं।
न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा, ‘‘इस अदालत का मानना है कि यौन हिंसा के आरोपों से जुड़े आपराधिक मामलों को पैसों के भुगतान के आधार पर रद्द नहीं किया जा सकता, क्योंकि ऐसा करने का मतलब होगा कि न्याय बिकाऊ है।’’
न्यायालय ने सोमवार को पारित आदेश में कहा कि उसने इस तथ्य पर विचार किया है कि प्राथमिकी से ही व्यक्ति और उसके परिवार के सदस्यों के खिलाफ गंभीर आरोपों का पता चलता है, जिसमें शिकायत दर्ज करने से रोकने के लिए अभियोजक (महिला) को लगातार धमकियां देना भी शामिल है।
अदालत ने कहा कि महिला ने शुरू में व्यक्ति से 12 लाख रुपये की मांग की थी, लेकिन बाद में 1.5 लाख रुपये की राशि पर समझौता हो गया।
महिला तलाकशुदा है और उसका एक बच्चा भी है। महिला ने प्राथमिकी में आरोप लगाया कि आरोपी ने खुद को तलाकशुदा बताया था और शादी का झूठा झांसा देकर उसके साथ यौन संबंध बनाए और यौन हिंसा की।
प्राथमिकी में आरोपियों द्वारा अनुचित वीडियो और फोटो शूट करने, उसे और उसके बेटे को जान से मारने की धमकी देने तथा बार-बार गलत बयान देने का भी आरोप लगाया गया है।
अभियोजक ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि यदि इस आधार पर प्राथमिकी रद्द कर दी जाती है कि पीड़िता ने आरोपी के प्रति गुस्से के कारण शिकायत दर्ज कराई थी, तो यह न्याय व्यवस्था का मजाक उड़ाना और आपराधिक न्याय प्रणाली का दुरुपयोग होगा।
उच्च न्यायालय ने कहा कि यदि महिला ने झूठे आरोप लगाए हैं और झूठी प्राथमिकी दर्ज कराई है, तो उसे इसके परिणाम भुगतने होंगे। न्यायालय ने कहा कि प्राथमिकी को रद्द करने की कोई वजह नहीं है।
अदालत ने कहा कि इस मामले में सुनवाई की आवश्यकता है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि आरोपी ने अपराध किया है या शिकायतकर्ता ने झूठी शिकायत दर्ज कराई है और अब वह 1.5 लाख रुपये लेकर मामले का निपटारा करना चाहती है।
भाषा
देवेंद्र