दिल्ली उच्च न्यायालय ने यमुना बाजार खाली करने के लिये दिये गए नोटिस में हस्तक्षेप से इनकार किया
दिलीप
- 19 May 2026, 06:01 PM
- Updated: 06:01 PM
नयी दिल्ली, 19 मई (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने पारिस्थितिकी के लिहाज से संवेदनशील यमुना बाजार इलाके के निवासियों को इलाका छोड़ने के लिए दिए गए नोटिस के मामले में मंगलवार को दखल देने से इनकार कर दिया।
न्यायमूर्ति पुरुषेंद्र कुमार कौरव ने कहा कि यमुना बाजार आवासीय कल्याण संघ की याचिका, जिसमें डीडीएमए के बेदखली नोटिस को चुनौती दी गई थी, विचारणीय नहीं है, क्योंकि इसमें स्थानीय लोगों की तरफ से याचिका के 'परिणाम भुगतने' को तैयार रहने के बाध्यकारी हलफनामे नहीं थे।
याचिका खारिज करते हुए अदालत ने कहा, ''यह अदालत इस रिट याचिका पर विचार करने को तैयार नहीं है। यह याचिका कोई जनहित याचिका नहीं है, बल्कि एसोसिएशन ने स्थानीय लोगों के कहने पर दायर की है। अधिकृत करने के पत्र न होने की वजह से, यह याचिका विचार करने योग्य नहीं है।''
न्यायमूर्ति कौरव ने साफ किया कि याचिकाकर्ता को यह आजादी होगी कि वह स्थानीय लोगों से अधिकार पत्र लेकर एक उचित याचिका दायर करें।
जब याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत से गुजारिश की कि वह ऐतिहासिक रूप से अहम घाटों पर किसी भी तरह की तोड़-फोड़ को टालने का निर्देश दे, तो अदालत ने जवाब दिया कि इसके लिए एक सही याचिका दायर की जानी चाहिए थी।
याचिका में एसोसिएशन ने दिल्ली आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (डीडीएमए) के 'बड़े पैमाने पर बेदखली' के नोटिसों को चुनौती देते हुए कहा था कि ये नोटिस 'आम धारणाओं और मनगढ़ंत आशंकाओं' पर आधारित हैं।
याचिका में कहा गया था कि घाटों पर किया गया निर्माण कोई 'हालिया कब्जा' नहीं है और न ही यह झुग्गी-झोपड़ी जैसा है; बल्कि रिकॉर्ड से यह पता चलता है कि 'पंडा समुदाय के लोग लंबे समय से इन घाटों पर रहते आ रहे हैं और धार्मिक अनुष्ठान करते आ रहे हैं, जिसे मान्यता भी मिली हुई है।''
याचिका में दलील दी गई, ''याचिकाकर्ता सम्मान के साथ यह बात कहते हैं कि वे यमुना के बाढ़ वाले इलाके के पर्यावरण के पुनरुद्धार या उसकी सुरक्षा का विरोध नहीं कर रहे हैं।''
इसमें कहा गया, ''याचिकाकर्ताओं की शिकायत सिर्फ इस बात को लेकर है कि बिना किसी वैज्ञानिक सोच-विचार, पुनर्वास की योजना, ऐतिहासिक विरासत के प्रति संवेदनशीलता वाले मूल्यांकन और ऐतिहासिक रूप से मौजूद पंडा घाटों और उनसे जुड़ी धार्मिक-सांस्कृतिक इमारतों पर अलग से विचार किए बिना, मनमाने और यांत्रिक तरीके से आपातकालीन शक्तियों का इस्तेमाल किया गया है।''
इसमें कहा गया, ''इसलिए, यह कार्रवाई भारत के संविधान के अनुच्छेद 14, 19, 21 और 25 का उल्लंघन करती है और इसे रद्द किया जाना चाहिए।''
दिल्ली आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (डीडीएमए) ने पांच मई को यमुना बाजार घाट में लगभग 310 रिहायशी ढांचों को नोटिस जारी किए, जिसमें वहां रहने वालों को 15 दिन के भीतर वह इलाका खाली करने का निर्देश दिया गया; ऐसा न करने पर, ढांचों को गिराने की कार्रवाई शुरू करने की चेतावनी दी गई।
डीडीएमए के अनुसार, हर साल यमुना में बाढ़ आने पर यमुना बाजार पानी में डूब जाता है, जिससे मानव जीवन, मवेशियों और संपत्ति को गंभीर खतरा पैदा होता है।
इसके बाद, 18 मई को डीडीए ने भी एक नया नोटिस जारी किया और वहां रहने वालों को निर्देश दिया कि वे ''सरकारी जमीन को अपनी मर्जी से खाली कर दें और नोटिस जारी होने की तारीख से 15 दिन के भीतर सभी अतिक्रमण, चाहे वे अस्थायी हों या स्थायी, और अपना सारा सामान हटा लें।''
भाषा वैभव दिलीप
दिलीप
1905 1801 दिल्ली