सोशल मीडिया प्रतिबंध से ऑस्ट्रेलियाई किशोरों की समाचार तक पहुंच घटी: अध्ययन
वैभव
- 18 May 2026, 01:56 PM
- Updated: 01:56 PM
( मिशेल डेजुअन्नी - क्वीन्सलैंड यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी, सिमोन चैम्बर्स एवं तान्या नोतले - वेस्टर्न सिडनी यूनिवर्सिटी )
सिडनी, 18 मई (द कन्वरसेशन) ऑस्ट्रेलिया में दिसंबर 2025 में सोशल मीडिया प्रतिबंध लागू होने से पहले इसके संभावित नकारात्मक प्रभावों को लेकर व्यापक चर्चा हुई थी।
इन चिंताओं में यह आशंका भी शामिल थी कि किशोरों का समाचार पढ़ना कम हो जाएगा। चूंकि अधिकतर युवा समाचारों के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं और कई उसी पर निर्भर हैं, इसलिए यह आशंका वास्तविक मानी जा रही थी।
अब, प्रतिबंध लागू होने के कुछ महीनों बाद प्रकाशित हमारे नए अध्ययन में पाया गया है कि जिन युवाओं पर इस प्रतिबंध का असर अधिक पड़ा, उनके यह कहने की संभावना भी अधिक रही कि उन्हें पहले की तुलना में कम समाचार मिल रहे हैं और उनके पास समाचारों तथा अपने लिए महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा के अवसर भी कम हो गए हैं।
अध्ययन के निष्कर्ष
फरवरी में हमने 10 से 17 वर्ष आयु वर्ग के 1,027 युवाओं का सर्वेक्षण किया। यह सर्वेक्षण उस दीर्घकालिक अध्ययन का हिस्सा था, जिसमें 2017 से ऑस्ट्रेलियाई युवाओं की समाचारों में रुचि और भागीदारी का अध्ययन किया जा रहा है।
सर्वेक्षण में युवाओं से पूछा गया कि सोशल मीडिया प्रतिबंध का उनके सोशल मीडिया इस्तेमाल और समाचारों से जुड़ाव पर क्या असर पड़ा।
सबसे पहले हमने यह जानने का प्रयास किया कि क्या प्रतिबंध ने युवाओं के सोशल मीडिया इस्तेमाल को प्रभावित किया है। इसके लिए उनसे पूछा गया कि प्रतिबंधित मंचों के उपयोग में कोई बदलाव आया या नहीं और यदि आया तो क्या उन्होंने उनका इस्तेमाल पूरी तरह बंद कर दिया या सिर्फ कम कर दिया।
अध्ययन में पाया गया कि प्रतिबंधित मंचों का इस्तेमाल करने वाले 16 वर्ष से कम आयु के 61 प्रतिशत युवाओं ने कहा कि उनके सोशल मीडिया इस्तेमाल में बहुत कम या कोई बदलाव नहीं आया। यानी अधिकतर युवाओं के लिए यह प्रतिबंध प्रभावी साबित नहीं हुआ।
वास्तव में केवल 26 प्रतिशत युवाओं ने कहा कि उनके सोशल मीडिया इस्तेमाल पर प्रतिबंध का असर पड़ा।
इसके बाद युवाओं से पूछा गया कि क्या इस प्रतिबंध ने उनके समाचारों से जुड़ाव को प्रभावित किया।
जिन युवाओं का सोशल मीडिया इस्तेमाल गंभीर रूप से प्रभावित हुआ, उनमें से 51 प्रतिशत ने कहा कि प्रतिबंध के कारण उन्हें पहले की तुलना में कम समाचार मिल रहे हैं।
अध्ययन में इसे गंभीर चिंता का विषय बताया गया है क्योंकि इससे संकेत मिलता है कि जैसे-जैसे अधिक युवाओं को सोशल मीडिया मंचों से दूर किया जाएगा, वैसे-वैसे उनका समाचारों से जुड़ाव भी घटता जाएगा।
नागरिक भागीदारी पर असर
ऑस्ट्रेलियाई पाठ्यक्रम, मूल्यांकन एवं रिपोर्टिंग प्राधिकरण (एसीएआरए) की 2025 की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि स्कूली छात्रों की नागरिक ज्ञान संबंधी समझ पिछले 20 वर्षों में सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है। यह स्थिति तब है जब अधिकतर युवा मानते हैं कि समुदाय से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय भूमिका निभाना महत्वपूर्ण है।
हमारे निष्कर्ष बताते हैं कि सोशल मीडिया प्रतिबंध से प्रभावित होने पर युवा उन मुद्दों से जुड़े समाचारों तक पहुंच खो रहे हैं जिनकी उन्हें चिंता है। साथ ही वे समाचारों पर कम चर्चा कर रहे हैं और अपने विचार साझा करने या किसी प्रकार की सामाजिक कार्रवाई में भाग लेने के अवसर भी कम पा रहे हैं।
हमारे पूर्व शोध में भी पाया गया था कि समाचारों से जुड़ाव युवाओं को अधिक जागरूक और सामाजिक मुद्दों पर प्रतिक्रिया देने में सक्षम महसूस कराता है।
कई अन्य अध्ययनों में भी यह सामने आया है कि समाचारों में रुचि और नागरिक भागीदारी के बीच गहरा संबंध है। जो लोग समाचारों से अधिक जुड़े रहते हैं, उनके सामुदायिक और सामाजिक मुद्दों में सक्रिय होने की संभावना भी अधिक रहती है।
सोशल मीडिया समाचारों का प्रमुख स्रोत
यह संभावना कम है कि सोशल मीडिया पर समाचारों से कट जाने के बाद युवा पारंपरिक समाचार माध्यमों की ओर लौटेंगे।
ज्यादातर ऑस्ट्रेलियाई युवाओं का कहना है कि पारंपरिक समाचार संस्थान उनकी बातों और जीवन अनुभवों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं देते। उनका मानना है कि मुख्यधारा के समाचार माध्यम युवाओं के लिए सुगम सामग्री नहीं बनाते और उन मुद्दों पर पर्याप्त ध्यान नहीं देते जो उनके लिए महत्वपूर्ण हैं।
सर्वेक्षण में 75 प्रतिशत युवाओं ने कहा कि समाचार संस्थानों को उनके वास्तविक जीवन की समझ नहीं है, जबकि 71 प्रतिशत ने कहा कि अपनी आयु वर्ग से संबंधित समाचार खोजना उनके लिए कठिन है।
पूर्व शोध में यह भी सामने आया कि ऑस्ट्रेलियाई समाचार संस्थान खबरों में युवाओं को बहुत कम तवज्जो देते हैं। उन्हें तस्वीरों और वीडियो में तो दिखाया जाता है, लेकिन उनकी राय या बयान शायद ही शामिल किए जाते हैं।
एक अन्य अध्ययन में पाया गया कि तात्कालिक समाचार घटनाओं में युवाओं को कई बार आलसी, खतरनाक और अधिकारवादी जैसे रूढ़िगत नजरिए से प्रस्तुत किया जाता है।
अध्ययनकर्ताओं के अनुसार यही वे कारण हैं जिनकी वजह से हाल के वर्षों में युवाओं ने समाचारों के लिए सोशल मीडिया का रुख किया।
क्या किया जाना चाहिए
अध्ययन में कहा गया है कि समय के साथ सोशल मीडिया प्रतिबंध की खामियां दूर होने पर अधिक युवाओं का इन मंचों से संपर्क टूट सकता है। ऐसे में जरूरी है कि युवाओं को अन्य समाचार स्रोतों से सार्थक तरीके से जोड़ने के उपाय किए जाएं।
शोधकर्ताओं ने कहा कि सबसे बड़ी चिंता विश्वास की है। युवाओं को यह समझाने की जरूरत है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में समाचारों की क्या भूमिका है, गुणवत्तापूर्ण पत्रकारिता कैसे की जाती है और ऑनलाइन किस पर भरोसा किया जाए, इस बारे में निर्णय कैसे लिए जाएं।
उन्होंने कहा कि यह कार्य मीडिया साक्षरता शिक्षा के जरिए किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए गुणवत्तापूर्ण पाठ्य सामग्री और शिक्षकों के प्रशिक्षण में निवेश जरूरी होगा।
ऑस्ट्रेलिया में पहले से ही मीडिया साक्षरता को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया गया है। 'एबीसी' के 'बीटीएन (बिहाइंड द न्यूज)' जैसे कार्यक्रम और 'स्क्विज किड्स' जैसी संस्थाएं समाचार साक्षरता संबंधी सामग्री तैयार कर रही हैं।
शोधकर्ताओं ने यह भी कहा कि मुख्यधारा के समाचार संस्थानों को युवाओं का अधिक निष्पक्ष और समावेशी प्रतिनिधित्व करना होगा ताकि वे स्वयं को सुना और समझा हुआ महसूस कर सकें।
अध्ययन में यह भी पाया गया कि तमाम तकनीकी बदलावों के बावजूद परिवार अब भी युवाओं के लिए समाचारों का पहला और सबसे भरोसेमंद स्रोत है। इसलिए अभिभावकों को यह समझने में मदद की जरूरत है कि बच्चे समाचारों को समझें और परखें, इसमें उनकी महत्वपूर्ण भूमिका है।
द कन्वरसेशन मनीषा वैभव
वैभव
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