अपराध की प्रकृति एकमात्र आधार नहीं: न्यायालय ने मधुमिता शुक्ला हत्याकांड के दोषी की सजा माफ की
वैभव
- 15 May 2026, 07:59 PM
- Updated: 07:59 PM
नयी दिल्ली, 15 मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने 2003 के बहुचर्चित मधुमिता शुक्ला हत्याकांड के एक दोषी की समय पूर्व रिहाई के अनुरोध वाली याचिका को शुक्रवार को विचारार्थ स्वीकार करते हुए कहा कि किसी अपराध की प्रकृति ही माफी से इनकार करने का एकमात्र आधार नहीं हो सकती।
न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने गृह मंत्रालय के नौ जुलाई, 2025 के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें दोषी रोहित चतुर्वेदी की समय पूर्व रिहाई के लिए उत्तराखंड सरकार की सिफारिश को खारिज कर दिया गया था।
उच्चतम न्यायालय ने गौर किया कि चतुर्वेदी ने बिना किसी छूट के 22 साल जेल में बिताए हैं।
न्यायालय ने फैसला सुनाते हुए टिप्पणी की, ''अपराध एक बात है, सुधार दूसरी। ध्यान सुधार पर होना चाहिए, न कि दंड देने पर।''
पीठ ने कहा, "हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि गृह मंत्रालय का दिनांक नौ जुलाई, 2025 का पत्र, जिसमें उत्तराखंड राज्य की सिफारिश को खारिज कर दिया गया और याचिकाकर्ता की समय से पहले रिहाई की याचिका को अस्वीकार कर दिया गया, मनमाना, तर्कहीन है, कानून और गुण-दोष के लिहाज से टिकाऊ नहीं है और इसलिए इसे रद्द किया जाता है।"
यह देखते हुए कि गृह मंत्रालय ने एक "अस्पष्ट और रहस्यमय" आदेश पारित किया है, उच्चतम न्यायालय ने कहा कि किसी व्यक्ति के अधिकारों और विशेष रूप से उसकी स्वतंत्रता को प्रभावित करने वाला कोई भी आदेश कारणों सहित होना चाहिए और उसमें उचित विचार-विमर्श झलकना चाहिए।
पीठ ने कहा, "कारणों का रिकॉर्ड रखना केवल एक औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह मनमानेपन से बचाव करता है और निर्णय लेने में पारदर्शिता, निष्पक्षता और जवाबदेही सुनिश्चित करता है। कारणों का अभाव निर्णय को निरर्थक बना देता है और यह पता लगाना असंभव हो जाता है कि प्रासंगिक कारकों पर विधिवत विचार किया गया था या नहीं।"
न्यायालय ने कहा कि यद्यपि क्षमादान के मामलों में कार्यपालिका का विवेकाधिकार व्यापक है, फिर भी यह "अनियंत्रित" नहीं है और इसका प्रयोग अनिवार्य रूप से प्रासंगिक, तर्कसंगत और गैर-भेदभावपूर्ण विचारों के आधार पर किया जाना चाहिए।
पीठ ने कहा कि कानून के शासन द्वारा शासित संवैधानिक शासन प्रणाली में, अपराध की जघन्यता के आधार पर ही माफी से इनकार नहीं किया जा सकता है।
पीठ ने कहा, "सजा में छूट देना सजा सुनाने की प्रक्रिया का विस्तार नहीं है, बल्कि यह कार्यपालिका का एक अलग काम है जो वर्तमान और भविष्य से संबंधित है, अर्थात् कैदी के आचरण, सुधार के प्रमाण और समाज में पुन: एकीकरण की संभावनाओं से संबंधित है।"
न्यायालय ने कहा, "अपराध की जघन्य प्रकृति के आधार पर ही इसे अस्वीकार करना इस अंतर को मिटाना है और माफी को अपराध की पूर्वव्यापी पुष्टि में परिवर्तित करना है, जिस पर आपराधिक न्याय प्रणाली पहले ही निर्णय दे चुकी है।"
उसने कहा कि न्याय किसी व्यक्ति को उसके जघन्य कृत्य के साये में स्थायी रूप से कैद करने की अनुमति नहीं देता है।
पीठ ने कहा, "कैदी के समग्र मूल्यांकन के बाद और सामाजिक हितों को कैदी के उचित और तर्कसंगत मानदंडों पर रिहाई के लिए विचार किए जाने के अधिकार के साथ संतुलित करने के बाद ही माफी का निर्णय लिया जाना चाहिए।"
न्यायालय ने कहा, "जैसा कि यूनानी विद्वान और दार्शनिक प्लेटो ने कहा था, शब्द या कर्म, विशेषाधिकार या वंचना के किसी भी साधन का प्रयोग किया जाना चाहिए जिससे अन्याय करने वाले व्यक्ति या अपराधी को अन्याय से घृणा हो और वह बार-बार अपराध करने से बचे।"
उच्चतम न्यायालय ने कहा कि चतुर्वेदी पहले से ही जमानत पर बाहर है और उसे आत्मसमर्पण करने की आवश्यकता नहीं है।
कवयित्री मधुमिता शुक्ला की नौ मई, 2003 को लखनऊ की पेपर मिल कॉलोनी में हत्या कर दी गई थी। उस समय वह गर्भवती थीं। उत्तर प्रदेश के पूर्व मंत्री अमरमणि त्रिपाठी को सितंबर 2003 में कवयित्री की हत्या के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया था, जिनके साथ कथित तौर पर उनका संबंध था।
इसके बाद, शुक्ला की हत्या की साजिश के सिलसिले में अन्य आरोपियों को भी गिरफ्तार किया गया।
उत्तराखंड की एक निचली अदालत ने 24 अक्टूबर 2007 को अमरमणि त्रिपाठी, पूर्व मंत्री की पत्नी मधुमणि त्रिपाठी, रिश्तेदार रोहित चतुर्वेदी और सहयोगी संतोष कुमार राय को शुक्ला की हत्या का दोषी पाया और उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई।
आपराधिक साजिश और हत्या के दोषी ठहराए गए चतुर्वेदी ने उत्तराखंड सरकार के समक्ष समय पूर्व रिहाई की अर्जी दाखिल की थी।
भाषा प्रशांत वैभव
वैभव
1505 1959 दिल्ली