दाऊदी बोहरा समुदाय में महिलाओं के खतना की प्रथा पर न्यायालय ने चिंता जताई
अविनाश
- 07 May 2026, 11:38 PM
- Updated: 11:38 PM
नयी दिल्ली, सात मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने दाऊदी बोहरा समुदाय के कुछ वर्गों में महिलाओं के खतना की प्रथा पर बृहस्पतिवार को चिंता जताई और कहा कि यह प्रथा संविधान के तहत "स्वास्थ्य" के दायरे में आ सकती है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद-25 के तहत सार्वजनिक व्यवस्था और नैतिकता के अलावा स्वास्थ्य के आधार पर भी धार्मिक प्रथाओं एवं अनुष्ठानों को प्रतिबंधित किया जा सकता है।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्ष वाली नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने महिलाओं के खतना की प्रथा को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की।
पीठ में न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना, न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश, न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, न्यायमूर्ति एजी मसीह, न्यायमूर्ति पीबी वराले, न्यायमूर्ति आर महादेवन और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची भी शामिल हैं।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा ने पीठ को बताया कि इस प्रथा को दुनिया के लगभग 59 देशों में प्रतिबंधित कर दिया गया है और मिस्र तथा ऑस्ट्रेलिया सहित कुछ देशों में अदालतों ने मामले में हस्तक्षेप किया है।
लूथरा ने कहा, "भारत में कोई विशिष्ट प्रतिबंध नहीं है।" उन्होंने कहा कि यहां अहम सवाल यह है कि क्या कोई समुदाय या संप्रदाय सहमति के अभाव में किसी नाबालिग के जीवन को प्रभावित करता है, क्योंकि नाबालिग के लिए सार्थक सहमति संभव ही नहीं है।
लूथरा ने पीठ को बताया कि यह प्रक्रिया सात साल की छोटी बच्चियों पर की जाती है और इससे उनके शरीर में बदलाव होते हैं, जो उनके यौन और प्रजनन स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं, क्योंकि इस प्रक्रिया में कई हजार नसें क्षतिग्रस्त हो जाती हैं।
लूथरा ने पीठ से कहा कि कई परिवार इस प्रथा का पालन इसलिए करते हैं, क्योंकि उन्हें इस पर अमल न करने पर धर्म से बहिष्कृत किए जाने का डर होता है।
उन्होंने कहा कि इस प्रथा के एक आवश्यक धार्मिक प्रथा होने का दावा नहीं किया जा सकता और इसे अनुच्छेद-26 के तहत किसी संप्रदाय के अधिकारों के अंतर्गत नहीं रखा जा सकता है।
न्यायमूर्ति बागची ने कहा, "जहां तक महिलाओं के खतना का सवाल है, हमें इन सभी मुद्दों और अन्य अधिकारों पर विस्तार से चर्चा करने की जरूरत भी नहीं हो सकती है। 'स्वास्थ्य' और 'सार्वजनिक स्वास्थ्य' शब्द ही इस मुद्दे को स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त हो सकते हैं।"
लूथरा ने कहा कि जहां कोई प्रथा शारीरिक स्वायत्तता में अतिक्रमण करती है और किसी महत्वपूर्ण अंग को विकृत करती है, वह अनिवार्य रूप से अनुच्छेद 25 और 26 के तहत सीमाओं, यानी सार्वजनिक व्यवस्था, स्वास्थ्य और नैतिकता का उल्लंघन करती है।
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि यह प्रथा अनुच्छेद 25 के तहत "नैतिकता" के दायरे में भी आ सकती है।
न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि इस धार्मिक प्रथा की गहन जांच की आवश्यकता होगी, क्योंकि इसका पालन न करने पर न सिर्फ बहिष्कार झेलना पड़ सकता है, बल्कि यह व्यक्ति की "शारीरिक, मानसिक अखंडता और यौन स्वायत्तता" पर भी प्रभाव डालता है।
न्यायमूर्ति वराले ने कहा कि इस प्रथा का प्रभाव कई गुना है।
न्यायमूर्ति बागची ने भी इस विचार का समर्थन करते हुए कहा कि इसका उद्देश्य महिलाओं की कामुकता को नियंत्रित करना है।
लूथरा ने दलील दी कि पीठ को समुदाय के भीतर सक्रिय सत्ता संरचनाओं और व्यक्तियों के सामने मौजूद सामाजिक विवशताओं पर भी विचार करना चाहिए।
प्रधान न्यायाधीश ने लूथरा से पूछा कि क्या वह यह सुझाव दे रहे हैं कि अनुच्छेद 25 और 26 के बीच परस्पर संबंध की परवाह किए बिना, अगर कोई धार्मिक प्रथा किसी व्यक्ति के अन्य मौलिक अधिकारों में हस्तक्षेप कर रही है, तो अदालत को हस्तक्षेप करना चाहिए।
लूथरा ने हां में जवाब देते हुए कहा कि इस प्रथा की शिकार नाबालिग लड़कियां हैं, जो सहमति देने में असमर्थ हैं।
कुछ अपीलकर्ताओं की ओर से पेश अधिवक्ता निजाम पाशा ने कहा कि महिलाओं के खतना की प्रथा का पालन न करने पर किसी प्रकार का बहिष्कार नहीं होता है।
इस प्रथा को "विकृति" के रूप में पेश किए जाने का विरोध करते हुए पाशा ने कहा कि समुदाय के भीतर इस प्रथा का पालन न करने के कोई दंडनीय परिणाम नहीं होते हैं, हालांकि सदस्यों का मानना हो सकता है कि इसके आध्यात्मिक परिणाम हो सकते हैं।
न्यायमूर्ति बागची ने विशेष रूप से यह प्रश्न पूछा कि क्या दाई (बोहरा समुदाय के धार्मिक प्रमुख) के निर्देश का उल्लंघन करने पर कोई परिणाम भुगतना पड़ता है।
पाशा ने कहा कि इसके कोई दंडनीय परिणाम नहीं हैं और अगर कोई नमाज नहीं अदा करता है, तो कोई दंड नहीं दिया जाता है। उन्होंने इसकी तुलना इस्लाम में पुरुषों के खतना की प्रथा से की।
न्यायमूर्ति बागची ने कहा, "सार्वजनिक स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से पुरुषों के खतना और महिलाओं के खतना में अंतर है।"
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने पाशा से पूछा कि इस प्रथा का उद्देश्य क्या था। इस पर पाशा ने उत्तर दिया, "महिलाओं के यौन सुख को बढ़ाना।"
न्यायमूर्ति अमानुल्लाह ने तुरंत हस्तक्षेप करते हुए कहा, "यह तो बिल्कुल विपरीत बात है।"
उन्होंने पाशा के इस प्रथा के पुरुषों के खतना से तुलना करने पर भी आपत्ति जताई।
न्यायमूर्ति अमानुल्लाह ने कहा, "मुझे आश्चर्य है कि इसकी तुलना पुरुषों के खतना से की जा रही है; यह एक अलग अवधारणा है। अपने तथ्यों को सही करें।"
याचिकाओं पर अगली सुनवाई 12 मई को होगी।
भाषा पारुल अविनाश
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