नफरत अब सामान्य बात हो गई है : नेता और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने की कड़ी कार्रवाई की मांग
माधव
- 06 May 2026, 10:03 PM
- Updated: 10:03 PM
नयी दिल्ली, छह मई (भाषा) राष्ट्रीय जनता दल (राजद) सांसद मनोज झा ने मंगलवार को समाज में नफरत को समान्य तौर पर लिये जाने को चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि चुनावी प्राथमिकताएं देश के सामाजिक ताने-बाने की रक्षा करने की आवश्यकता पर हावी होती जा रही हैं।
झा 'एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन आफ सिविल राइट्स' (एपीसीआर) द्वारा "हेट क्राइम ट्रैकर" की शुरुआत के अवसर पर बोल रहे थे।
झा ने कहा कि एक सांसद का घृणा अपराधों से संबंधित एक निजी विधेयक पिछले छह महीनों से संसद में लंबित है। उन्होंने कहा, "हम एक ऐसे मोड़ पर हैं जहां नफरत अब चौंकाने वाली बात नहीं रह गई है; यह रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गई है।"
उन्होंने कहा कि राजनीति संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करने से हटकर चुनाव जीतने के संकीर्ण लक्ष्य की ओर बढ़ रही है। उन्होंने कहा, "असली चुनौती यह है कि हम अल्पकालिक राजनीतिक लाभ चुनें या भारत के दीर्घकालिक दृष्टिकोण को।"
झा ने स्वतंत्र 'हेट क्राइम ट्रैकर' जैसी दस्तावेज़ीकरण प्रक्रियाओं को मजबूत करने की आवश्यकता पर बल दिया और न्यायपालिका की भूमिका पर विशेष ध्यान देने का सुझाव दिया। उन्होंने कहा, "घटनाओं पर नजर रखना महत्वपूर्ण है, लेकिन यह समझना भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि अदालतों सहित संस्थाएं किस प्रकार प्रतिक्रिया देती हैं और कई बार इन प्रक्रियाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।"
आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह ने कहा कि आधिकारिक आंकड़े और स्वतंत्र रूप से दर्ज की गई घटनाओं में काफी अंतर है। उन्होंने कहा, ''सरकारी आंकड़े अक्सर मामलों को दंगों जैसी बड़ी श्रेणियों में जोड़ देते हैं, लेकिन इससे हिंसा की पहचान-आधारित प्रकृति सामने नहीं आ पाती।''
सिंह ने ध्रुवीकरण को बढ़ावा देने वाले मीडिया और सोशल मीडिया मंचों के कुछ वर्गों की भी आलोचना की। सिंह ने कहा, "जब सार्वजनिक चर्चा लगातार धार्मिक पहचानों के इर्द-गिर्द घूमती है, तो यह जनता के दृष्टिकोण को खतरनाक तरीके से प्रभावित करती है।"
कार्यकर्ता और पूर्व नौकरशाह हर्ष मंदर ने पश्चिम बंगाल और ओडिशा जैसे राज्यों में चुनावों के बाद अल्पसंख्यक समुदायों के प्रति शत्रुता बढ़ने का आरोप लगाया और इसे चिंताजनक प्रवृत्ति करार दिया।
उन्होंने कहा, "कुछ क्षेत्रों में, अल्पसंख्यक समुदाय का हिस्सा होना ही बहिष्कार या हिंसा का आधार बन रहा है। यह वह भारत नहीं है जिसकी कल्पना हमारे संस्थापक नेताओं ने की थी।"
पत्रकार कुर्बान अली ने नफरती भाषण पर स्पष्ट और लागू करने योग्य दिशानिर्देशों के अभाव को उजागर करते हुए कहा कि 2022 में भारत के उच्चतम न्यायालय द्वारा स्वतः संज्ञान लेकर कार्रवाई किये जाने के निर्देश के बावजूद, कार्यान्वयन कमजोर बना हुआ है।
एपीसीआर हेट ट्रैकर वेबसाइट के अनुसार, 2014 से भारत में घृणा से संबंधित 1,914 घटनाएं दर्ज की गई हैं, जिनमें 1,153 घटनाएं 'घृणा अपराध' और 761 घटनाएं 'नफरती भाषण' के रूप में वर्गीकृत हैं।
ट्रैकर के अनुसार, उत्तर प्रदेश 2014 से दर्ज 318 घटनाओं के साथ सूची में सबसे ऊपर है, इसके बाद मध्य प्रदेश (126) और महाराष्ट्र (104) का स्थान है। ट्रैकर के अनुसार, 228 मामलों में प्राथमिकी दर्ज की गई।
एपीसीआर के एक प्रतिनिधि ने बताया कि डेटाबेस मीडिया में प्रकाशित घटनाओं से संकलित किया गया है।
भाषा
अमित माधव
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