सिंधु जल संधि भाग दो : बाधा डालना, दोहन करना और समाधान को विलंबित रखना
मनीषा
- 06 May 2026, 10:40 AM
- Updated: 10:40 AM
(निम्नलिखित आलेख सिंधु जल पर पूर्व भारतीय आयुक्त प्रदीप कुमार सक्सेना द्वारा लिखे गए दो लेखों की कड़ी में अंतिम लेख है)
ज़िम्मेदारियों का असमान वितरण, असमान रियायत और पाकिस्तान का शस्त्रीकरण
भाग दो : अवरोध, शोषण और लंबित हिसाब किताब
1. पाकिस्तान द्वारा संधि का शस्त्रीकरण
1.1. भारतीय विकास में सुनियोजित बाधा
संधि पर हस्ताक्षर होने के बाद से, पाकिस्तान ने लगातार इसके विवाद समाधान प्रावधानों का उपयोग एक रणनीतिक हथियार के रूप में किया है, जिसका उद्देश्य वास्तविक विवाद समाधान के बजाय विकास कार्यों में विलंब करना और उन्हें प्रभावी ढंग से बाधित करना रहा है। पश्चिमी नदियों पर भारत की लगभग हर जलविद्युत परियोजना पर पाकिस्तान आपत्ति दर्ज करता रहा है। यहां तक कि संधि के अनुसार जिन परियोजनाओं को स्पष्ट रूप से अनुमति मिल चुकी है, उन्हें भी वह तकनीकी रूप से चुनौती देता है। यही वजह है कि कई परियोजनाएं आगे न बढ़ सकीं और इनके लिए मजबूर होकर मध्यस्थता का सहारा लेना पड़ा।
बगलिहार, किशनगंगा, पाकल दुल और तुलबुल सहित सभी परियोजनाएं लंबे समय से पाकिस्तानी चुनौतियों का सामना कर रही हैं। कई मामलों में, पाकिस्तान ने बाढ़ नियंत्रण सहित नियंत्रित जल प्रवाह के लिए भारतीय परियोजनाओं के संभावित लाभों को स्वीकार किया है, जबकि साथ ही साथ उसने उनका विरोध भी किया है।
पाकिस्तान की इस प्रवृत्ति से पता चलता है कि पाकिस्तानी आपत्तियां वास्तव में संधि के अनुपालन से संबंधित नहीं हैं; बल्कि वे कानूनी वैधता की परवाह किए बिना जम्मू और कश्मीर में भारतीय विकास को रोकने से संबंधित हैं।
1.2 'जल युद्ध' की कथा और उसका झूठा प्रसार
भारत ने हमेशा ही संधि के नियमों का पालन किया है और पाकिस्तान ने उसकी इसी बात का फायदा उठाया है। उसने एक ऐसी कहानी पेश की है, जिसमें भारत को नकारात्मक रूप से चित्रित किया गया है। उसकी इस कहानी में भारत को "जल आक्रांता" के रूप में दर्शाया गया है। पाकिस्तानी अधिकारियों, शिक्षाविदों और राजनयिक अधिकारियों ने बार-बार यह दर्शाने की कोशिश की है कि भारत पानी का उपयोग पाकिस्तान के खिलाफ एक हथियार के तौर पर कर सकता है, जबकि वास्तविकता यह है कि भारत सदैव उसी संधि का निष्ठापूर्वक पालन करते आया है।
पाकिस्तान द्वारा रचित इस विमर्श में भारत को, जो कि नदी के ऊपरी क्षेत्र वाला देश है, उसे एक खतरा बनाकर पेश किया गया है। और यही काल्पनिक और कोरा विमर्श दुनियाभर के दर्शकों तक पहुंचाने की कोशिश की गई है।
गौरतलब है कि यह झूठा विमर्श केवल उन बाहरी लोगों पर काम करता है जो इस संधि की सच्चाई से वाकिफ नहीं हैं। पाकिस्तान ने अपने इस विमर्श का उपयोग भारत पर कूटनीतिक दबाव बनाने के लिए किया है, ताकि वह अंतरराष्ट्रीय और बहुपक्षीय समूहों का समर्थन और सहानुभूति हासिल कर सके।
ध्यान देने वाली बात यह है कि इस वजह से वैध संधि अधिकारों के बावजूद भारत अपनी पूर्ण क्षमता का सीमित ही उपयोग कर पाया है।
इस रणनीति की एकमात्र विडंबना यह है कि भारत ने संधि का एक बार भी उल्लंघन नहीं किया है - न तो 1965 के युद्ध के दौरान, न ही 1971 के युद्ध के दौरान, न ही 1999 के कारगिल संघर्ष के दौरान, और न ही संधि के संचालन के 65 वर्षों में किसी अन्य समय पर। भारत ने संधि का पालन बनाए रखा है जबकि पाकिस्तान ने अपनी भूमि का उपयोग भारत के खिलाफ आतंकवादी गतिविधियों को समर्थन देने और बढ़ावा देने के लिए किया है।
2. भारत के लिए इसके परिणाम
2.1 विकास क्षमता का पूरा दोहन न कर पाना
इस संधि की सीमाओं का सिंधु बेसिन में भारत के विकास पर स्पष्ट और दीर्घकालिक प्रभाव पड़ा है। राजस्थान और पंजाब के विशाल क्षेत्र, जहां सिंचाई की जा सकती थी, आज भी शुष्क हैं या वैकल्पिक, अधिक महंगे जल स्रोतों पर निर्भर हैं। छह दशकों में कृषि उत्पादकता में आई कमी भी एक अपूरणीय आर्थिक क्षति है।
2.2 जम्मू और कश्मीर की अविकसित जलविद्युत क्षमता
जम्मू और कश्मीर पर इसका गंभीर असर हुआ है। यह केंद्र शासित प्रदेश पश्चिमी नदियों के किनारे बसा है और इसमें अपार, लगभग अप्रयुक्त जलविद्युत क्षमता मौजूद है। संधि की रूपरेखा संबंधी प्रतिबंधों, पाकिस्तान की व्यवस्थित आपत्तियों और बहुस्तरीय, लंबे समय तक चलने वाली विवाद समाधान प्रक्रिया के निरंतर जोखिम के कारण इस क्षमता का विकास हर कदम पर बाधित हुआ है। स्थानीय आबादी अब इस संधि को साझा लाभ के ढांचे के बजाय आर्थिक हाशिए पर धकेलने वाले एक साधन के रूप में देखने लगी है—एक बाहरी थोपा हुआ बंधन जो उन्हें अपने क्षेत्र से बहने वाले प्राकृतिक संसाधनों का विकास करने से रोकता है।
2.3. ऊर्जा सुरक्षा पर प्रभाव
पश्चिमी नदियों की जलविद्युत क्षमता का सर्वोत्तम उपयोग करने में भारत की असमर्थता का सीधा असर राष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ता है। संधि की पाबंदियों का मतलब है कि इसकी संभावित क्षमता—एक स्वच्छ, नवीकरणीय और आर्थिक रूप से कुशल ऊर्जा स्रोत के तौर पर—की बलि सिर्फ़ इसलिए चढ़ गई है, क्योंकि पाकिस्तान इस असंतुलित समझौते में भारत को मिले सीमित अधिकारों में भी रणनीतिक रूप से अड़चन डाल रहा है।
3. भारत का पक्ष
इस संधि का उद्देश्य 'सद्भावना और मित्रता की भावना' के साथ 'सिंधु नदी प्रणाली के जल का सबसे पूर्ण और संतोषजनक उपयोग' करना था- एक ऐसा परिदृश्य जो अब मौजूद नहीं है।
इन संधियों की वैधता केवल कानून के बल से ही नहीं, बल्कि सभी हस्ताक्षरकर्ताओं द्वारा इनके नियमों के सद्भावपूर्ण पालन से भी प्राप्त होती है। पाकिस्तान द्वारा भारत के विरुद्ध विदेश नीति के एक साधन के रूप में राज्य-प्रायोजित आतंकवाद का दस्तावेजी और निरंतर उपयोग—जिसकी परिणति 2001 के संसद हमले, 2008 के मुंबई हमलों और हाल ही में अप्रैल 2025 के पहलगाम हमले जैसी भयावह घटनाओं में देखी गई—भारत द्वारा अंतरराष्ट्रीय विश्व संधि (आईडब्ल्यूटी) के निरंतर अनुपालन के आधार को मौलिक रूप से चुनौती देता है।
द्विपक्षीय समझौतों का चुनिंदा रूप से पालन नहीं किया जा सकता:
कोई भी देश एक ही समय में अंतर-राज्यीय आचरण के मूलभूत मानदंडों का उल्लंघन करते हुए अपने वार्ताकार सहयोगी से संधि दायित्वों को पूरा करने की मांग नहीं कर सकता जिससे मानदंड तोड़ने वाले देश को असमान रूप से लाभ हो।
यह संधि तब तक उचित रूप से कार्य नहीं कर सकती जब तक कि केवल भारत ही नियमों का पालन करे और पाकिस्तान कुटिलतापूर्ण चालें चले।
भारत ने हमेशा ही एक स्पष्ट रुख अपनाया है। भारत का यह कदम एक ऐसे दावे को सामने रखता है जिसकी दरकार लंबे समय से थी कि अंतरराष्ट्रीय समझौते दो-तरफ़ा होते हैं। इसलिए, दोनों पक्षों के लिए अंतरराष्ट्रीय समझौते का पालन करना अनिवार्य है।
4. निष्कर्ष
सिंधु जल संधि को लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की एक बड़ी सफलता के रूप में सराहा जाता रहा है। इस शोधपत्र में यह तर्क दिया गया है कि इस तरह का वर्णन वास्तव में जो हुआ उसे पूरी तरह से गलत तरीके से प्रस्तुत करता है: यह एक ऐसी वार्ता प्रक्रिया थी जिसमें पाकिस्तानी हठधर्मिता को रियायतों से पुरस्कृत किया गया और भारतीय सद्भावना का व्यवस्थित रूप से दुरुपयोग करके एक ऐसा समझौता तैयार किया गया जो शुरुआत से ही अनुचित था।
इसके बावजूद, भारत ने 80 प्रतिशत जल पाकिस्तान को सौंप दिया। इस समर्पण को सुगम बनाने के लिए 62 मिलियन पाउंड (वर्तमान मूल्य में लगभग 2.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर) का भुगतान किया, अपने क्षेत्र पर एकतरफा परिचालन प्रतिबंधों को स्वीकार किया, और 65 वर्षों तक इसका कड़ाई से पालन किया - जिसमें पाकिस्तान द्वारा थोपे गए कई युद्ध और सीमा पार आतंकवाद का निरंतर समर्थन शामिल है।
इसके बदले में, भारत को एक ऐसी संधि मिली है जिस पर सद्भावना के साथ सहमति बनी थी लेकिन पाकिस्तान उसे विकास में बाधा डालने के एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करता है; साथ ही उसे 'जल युद्ध' का एक ऐसा विमर्श मिला है जिसे वह बिना किसी तथ्यात्मक आधार के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैलाता है। परिणामस्वरूप आज भी भारत के बड़े हिस्से अविकसित हैं और वे विकास की राह देख रहे हैं।
भारत का यह कदम सिंधु बेसिन में अपने वैध हितों की रक्षा करना है। यह आक्रामकता नहीं, बल्कि एक लंबे समय से चली आ रही अन्यायपूर्ण व्यवस्था को सुधारना है। भारत ने हमेशा ही सद्भावनापूर्ण व्यवहार किया है, लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण है कि उसकी यह भावना एकतरफा रही।
जो लोग यह सवाल करते हैं कि अब यह संधि स्थगित क्यों हैं तो आपको यह बात याद रखनी चाहिए कि सही निर्णय हमेशा सही होता है, चाहे वह निर्णय किसी भी समय लिया जाए।
* लेखक : प्रदीप कुमार सक्सेना (सिंधु जल के लिए पूर्व भारतीय आयुक्त)
भाषा नरेश
नरेश मनीषा
मनीषा
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