धनशोधन मामले में अल-फलाह के प्रमुख की जमानत अर्जी खारिज, अदालत ने गंभीर आरोपों का हवाला दिया
माधव
- 04 May 2026, 08:54 PM
- Updated: 08:54 PM
नयी दिल्ली, चार मई (भाषा) दिल्ली की एक अदालत ने 493 करोड़ रुपये के धन शोधन मामले में अल-फलाह विश्वविद्यालय समूह के चेयरमैन जवाद अहमद सिद्दीकी की जमानत अर्जी यह कहते हुए खारिज कर दी है कि उन पर लगे आरोप "गंभीर प्रवृत्ति के हैं।"
इस मामले की जांच प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) कर रहा है।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश शीतल चौधरी प्रधान ने कहा कि आरोपी अल-फलाह विश्वविद्यालय और उससे संबद्ध संस्थानों के प्रशासन एवं वित्त प्रबंधन में "अहम भूमिका" रखता है और अगर उसे जमानत पर रिहा किया जाता है, तो वह गवाहों को प्रभावित कर सकता है।
न्यायमूर्ति प्रधान ने कहा कि सभी तथ्यों, अपराध की गंभीरता और याचिकाकर्ता के पिछले आपराधिक इतिहास को देखते हुए इस स्तर पर जमानत के लिए कोई आधार नहीं बनता है।
दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा ने अल-फलाह चैरिटेबल ट्रस्ट में कथित वित्तीय और प्रशासनिक अनियमितताओं के लिए फरवरी में सिद्दीकी को गिरफ्तार किया था। मार्च में ईडी ने उन्हें जेल से अपनी हिरासत में ले लिया था।
अदालत ने दो मई के अपने आदेश में कहा, "सभी तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, चूंकि याचिकाकर्ता/आरोपी के खिलाफ आरोप गंभीर प्रकृति के हैं, इस स्तर पर जमानत का कोई आधार नहीं बनता है। नतीजतन, जवाद अहमद सिद्दीकी की जमानत अर्जी खारिज की जाती है।"
अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया साक्ष्यों से साबित होता है कि सिद्दीकी का अपराध की उक्त आय से सीधे तौर पर या किसी न किसी तरीके से संबंध हो सकता है।
उसने कहा, "यह स्पष्ट है कि अल-फलाह विश्वविद्यालय/ट्रस्ट/कॉलेज से उत्पन्न 'प्रूफ ऑफ कॉन्सेप्ट (पीओसी)' उन पक्षों के माध्यम से भेजे गए थे... जिनका स्वामित्व सिद्दीकी की पत्नी, बच्चों और भरोसेमंद कर्मचारियों के पास था, लेकिन अंततः इन पर नियंत्रण उन्हीं (सिद्दीकी) का था। इनके (पीओसी) जरिये भारत से पैसा विदेश भेजा गया और वहां व्यवसाय एवं चल-अचल संपत्तियों में निवेश किया गया।"
ईडी ने अदालत बताया कि उसकी जांच में एक विस्तृत कार्यप्रणाली का खुलासा हुआ है, जिसके तहत विश्वविद्यालय ने राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद (एनएएसी) और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की मान्यता के फर्जी और भ्रामक दावों के जरिये छात्रों और अभिभावकों को धोखा दिया।
जांच एजेंसी ने कहा कि इन गतिविधियों के चलते लगभग 493.24 करोड़ रुपये की "अपराध की आय" प्राप्त हुई, जो शुल्क रसीदों के रूप में थी।
ईडी ने आरोप लगाया कि सिद्दीकी ने अल-फलाह चैरिटेबल ट्रस्ट से धनराशि निकालकर अपने निजी खातों में अंतरित की और विभिन्न निवेश बाजारों में लगाई। एजेंसी ने दावा किया कि इस धनराशि के सुव्यवस्थित हेरफेर और धन शोधन के लिए कई संस्थाएं बनाई गईं और उनका इस्तेमाल "माध्यम" के रूप में किया गया।
अल फलाह विश्वविद्यालय पहले उस समय जांच के दायरे में आया था, जब यह खुलासा हुआ था कि नवंबर 2025 में लाल किले के पास विस्फोट में शामिल डॉ. उमर नबी इस संस्थान में कार्यरत था।
बहस के दौरान अभियोजन पक्ष ने अदालत को बताया कि सिद्दीकी गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत दर्ज एक मामले में भी आरोपी हैं, जिसमें विस्फोटक सामग्री तैयार करने से संबंधित गंभीर आरोप हैं।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि सिद्दीकी लाल किले के पास बम विस्फोट से जुड़े मामले में भी सह-आरोपी हैं।
उसने कहा कि अल-फलाह के प्रबंध न्यासी और चांसलर के रूप में सिद्दीकी ने वैधानिक दायित्वों का उल्लंघन करते हुए धर्मार्थ और शैक्षणिक संस्थानों का व्यक्तिगत, पारिवारिक एवं व्यावसायिक लाभ के साधन के रूप में इस्तेमाल करके अपने न्यासी कर्तव्यों का दुरुपयोग किया।
अदालत ने कहा, "रिकॉर्ड में मौजूद सामग्री से स्पष्ट रूप से स्थापित होता है कि याचिकाकर्ता कई संस्थानों और वित्तीय चैनलों पर नियंत्रण रखता है और वह स्तरीय लेनदेन एवं विदेशी संबंधों वाली संस्थाओं के जरिये धन के हेरफेर में शामिल है।"
उसने कहा कि अगर सिद्दीकी को जमानत पर रिहा किया जाता है, तो वह गवाहों को प्रभावित कर सकते हैं (जिनमें से कई संस्थान के कर्मचारी होने के नाते सीधे उनके अधीन हैं) या अपने व्यापक वित्तीय संसाधनों और सीमा पार संपर्कों के जरिये कानूनी प्रक्रिया से बच सकते हैं।
भाषा पारुल माधव
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