केरल से ही वामपंथी सत्ता का सूर्योदय हुआ था, वहीं से सूर्यास्त हुआ
अविनाश
- 04 May 2026, 08:36 PM
- Updated: 08:36 PM
नयी दिल्ली, चार मई (भाषा) केरल में वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) की हार से न सिर्फ इस प्रदेश से वामपंथी सरकार की विदाई हो गयी, बल्कि पांच दशक बाद पहली बार ऐसी स्थिति बनी जब देश के किसी राज्य में वाम दलों की सरकार नहीं है।
जिस केरल से वाम दलों ने पहली बार 1957 में सत्ता का सूर्योदय देखा था, आज वहीं से उनका सूर्यास्त हो गया।
वर्ष 1957 में देश में गैर-कांग्रेसवाद को उस वक्त हवा मिली जब ईएमएस नंबूदिरीपाद की अगुवाई में पहली बार केरल में वामपंथी सरकार बनी।
इसके बाद कम्युनिस्ट पार्टियों ने धीरे-धीरे देश के अलग-अलग हिस्सों में अपने पैर पसारे और पश्चिम बंगाल में तो 1977 से लगातार 34 वर्षों तक मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी सत्ता में रही, जहां आज वह एक विधानसभा सीट जीतने के लिए संघर्ष कर रही है।
वर्ष 1977 के बाद पहली बार ऐसा होगा कि जब देश के किसी राज्य में वाम दलों की सरकार नहीं है।
वर्ष 2016 से एलडीएफ द्वारा शासित केरल, आखिरी राज्य था जहां वाम दलों की सत्ता थी।
इससे पहले पश्चिम बंगाल में 2011 और त्रिपुरा में 2018 में सत्ता से उसकी विदाई हुई।
दशकों से केरल वामपंथी राजनीति के एक प्रमुख केंद्र के रूप में स्थापित हुआ, जहां मुख्य रूप से दो मोर्चों एलडीएफ और यूडीएफ के बीच सत्ता बदलती रही है। इस प्रदेश में सत्ता से बाहर रहने के दौरान भी वामपंथियों ने एक मजबूत कैडर नेटवर्क और लगातार चुनावी उपस्थिति बरकरार रखी।
राष्ट्रीय स्तर पर वामपंथ एक समय कहीं अधिक प्रभावशाली स्थिति में था। स्वतंत्रता के बाद के वर्षों में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) संसद में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के रूप में उभरी, जो इसकी प्रारंभिक संगठनात्मक ताकत और श्रमिकों और किसानों के बीच अपील को दर्शाती है।
वर्ष 1990 और 2000 के दशक के दौरान, वामपंथी दल लोकसभा में एक महत्वपूर्ण समूह बने रहे, जो अक्सर गठबंधन राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे।
वामपंथी दलों की 1990 के दशक में लोकसभा में संयुक्त ताकत आम तौर पर 40 से 50 सदस्यों के बीच थी, जिससे उन्हें राष्ट्रीय परिदृश्य में एक अहम भूमिका मिलती थी।
उनका प्रभाव 2004 में चरम पर था, जब उन्होंने 61 सीटें जीती थीं और कांग्रेस के नेतृत्व वाली संप्रग सरकार को बाहर से समर्थन दिया एवं नीतिगत निर्णयों, विशेषकर कल्याणकारी योजनाओं और आर्थिक मुद्दों पर काफी प्रभाव डाला।
वर्ष 1996 में संयुक्त मोर्चा सरकार बनने पर माकपा से प्रधानमंत्री बनने की स्थिति पैदा हुई थी। पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु को प्रधानमंत्री पद की पेशकश की गई थी, तो माकपा के ''केरल के धड़े'' ने इसके खिलाफ रुख अपनाया और बसु ने इस पद को अस्वीकार कर दिया था।
वामपंथी ताकत में यह गिरावट अर्थव्यवस्था और राजनीति में संरचनात्मक परिवर्तनों के साथ मेल खाती है।
आर्थिक उदारीकरण और अनौपचारिक क्षेत्र के विस्तार ने पारंपरिक श्रम आधारों को कमजोर कर दिया, जबकि पहचान आधारित राजनीति के उदय ने चुनावी विमर्श को नया आकार दिया। जिन राज्यों में वामपंथियों ने लंबे समय तक शासन किया, वहां सत्ता विरोधी लहर और संगठनात्मक सुस्ती ने भी चुनावी असफलताओं में योगदान दिया।
वर्तमान लोकसभा में माकपा के पांच जबकि भाकपा (माले) लिबरेशन के दो सांसद हैं।
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